अमर बलिदानी की प्रेरणादायक कहानी, 84 दिनों की भूख हड़ताल ने कंपा दी थी राजशाही
“मां तुझे कमा कर देने वाले तो तेरे दो अन्य बेटे हैं ही, मुझे तू उनके लिए छोड़ दे जिनका कोई बेटा नहीं है।”
– श्रीदेव सुमन
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त्याग, संघर्षशील एवं क्रांतिकारियों की जन्मस्थली होने का सदियों पुराना गौरव प्राप्त है उत्तराखंड के जनपद टिहरी गढ़वाल को। सत्रहवीं सदी में गढ़वाल के छियालीसवें राजा महिपतशाह के प्रमुख सेनापति व मंत्री माधो सिंह भंडारी की बहादुरी, उदारता व त्याग के किस्से हों या फिर टिहरी के राजा जयकृत शाह, प्रद्दुम्न शाह व सुदर्शनशाह के शासन काल में प्रमुख चित्रकार व कवि राजा के पक्ष में नहीं, बल्कि जनता के पक्ष में ख्यातिप्राप्त चित्रकार व कवि मोलाराम (गढ़वाल पेन्टिंग्स के नाम से संकलित चित्र आर्ट गैलरी बोस्टन म्यूजियम में मौजूद) विश्व प्रसिद्ध हैं। ब्रिटिश सरकार द्वारा सेना के सर्वोच्च सम्मान विक्टोरिया क्रॉस से सम्मानित प्रथम विश्व युद्ध के योद्धा राइफलमैन गबर सिंह नेगी, स्वाधीनता संग्राम में हिस्सेदारी से लेकर महात्मा गाँधी के नमक सत्याग्रह आंदोलन में अहम भूमिका निभाते हुए रियासत में राजशाही के जुल्मों के खिलाफ लड़कर सामंतशाही व्यवस्था से डटकर मुकाबला करने वाले वीर, साहसी व त्यागी शहीद श्रीदेव सुमन हों या कृषक आंदोलन के उत्साही नेता व ओजस्वी वक्ता नागेन्द्र सकलानी, आकाशवाणी दिल्ली में गढ़वाली संगीत के संयोजक व सहायक नाट्य निदेशक गोविन्द चातक, प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुन्दरलाल बहुगुणा, भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने वाले परिपूर्णानंद पैन्यूली, विद्वान संपादक सत्य प्रसाद रतूड़ी, आचार्य गोपेश्वर कोठियाल, पंडित कृष्णकान्त टोडरिया, कहानीकार विद्यासागर नौटियाल, उत्तराखंड राज्य आंदोलन के पुरोधा उत्तराखंड के गाँधी पंडित इन्द्रमणि बड़ोनी आदि के त्याग व पुरुषार्थ के कारण हम स्वयं को गौरवान्वित महसूस करते हैं।
अमर बलिदानी की प्रेरणादायक कहानी
बलिदान दिवस के पर त्याग व बलिदान की प्रतिमूर्ति अमर शहीद ‘श्रीदेव सुमन’ के प्रेरित प्रसंग साझा करने का मौका मिला है। जनपद टिहरी के ग्राम जौल पट्टी बमुण्ड में 12 मई 1915 को पण्डित हरिराम बड़ोनी के घर जन्मे प्रतिभावान बच्चे के बचपन का नाम ‘श्रीदत्त’ रखा गया। प्रारंभिक शिक्षा गाँव में हुई। 1931 में टिहरी से मिडिल परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद आगे की पढ़ाई देहरादून से करने के साथ-साथ तभी से स्वाधीनता संग्राम में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी निभानी प्रारम्भ कर दी। गाँधी जी के नमक सत्याग्रह आंदोलन के दौरान उन्हें कोड़ों की सजा भी भुगतनी पड़ी। दिल्ली जाकर आगे की पढ़ाई जारी रखते हुए 1937 में उन्होंने अपना एक काव्य संग्रह ‘सुमन सौरभ’ प्रकाशित किया। साथ ही टिहरी रियासत में राजशाही के जुल्मों के खिलाफ लड़ने के उद्देश्य से ‘गढ़ देश सेवा संघ’ नाम से संस्था बनाई।
1938 में विनयलक्ष्मी सकलानी से विवाह हुआ। विनयलक्ष्मी की शिक्षा व्यवस्था महिला आश्रम वर्धा और फिर महिला विद्यालय कनखल में की। इधर, 5 जून 1938 में गढ़वाल की प्राचीन राजधानी श्रीनगर में गढ़वाल जिला कांग्रेस कमेटी का राजनीतिक सम्मेलन आयोजित हुआ था, जिसमें पंडित जवाहरलाल नेहरु भी आए। सम्मेलन में ‘श्रीदेव सुमन’ ने बड़े प्रभावशाली ढंग से टिहरी के लोगों की समस्याओं को रखा। पंडित नेहरू से इस विषय पर उनसे अलग से भी बातचीत की। वर्ष 1939 के आरंभ में देहरादून में टिहरी राज्य प्रजा मंडल की स्थापना की गई। श्रीदेव सुमन इसकी संयोजक समिति के मंत्री चुने गए। उनकी योग्यता व उत्साहवर्धक भूमिका से आकर्षित होकर इसी वर्ष लुधियाना में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् के अधिवेशन में परिषद् के अध्यक्ष पंडित नेहरू ने उन्हें लोक परिषद की स्थायी समिति में हिमालय प्रान्तीय देशी राज्यों के प्रतिनिधि के रूप में चुना।
मात्र 24 वर्ष की आयु में इतनी बड़ी जिम्मेदारियां सिर पर आने के बाद श्रीदेव सुमन का जीवन बहुत व्यस्त हो गया। वे कभी दिल्ली दौड़ते तो कभी वर्धा, कभी शिमला तो कभी बम्बई। तमाम व्यस्तताओं के बीच वे गांव जाने का समय जरूर निकालते थे।
दिल्ली में हुआ प्रजा सम्मेलन
अप्रैल 1940 में दिल्ली में सुमन की अध्यक्षता में ‘गढ़वाल राज्य प्रवासी प्रजा सम्मेलन’ आयोजित हुआ। इसी समय के आसपास वे कांग्रेस सत्याग्रह समिति की गढ़वाल उपसमिति के संयोजक भी चुने गए। उन्होंने टिहरी जाकर जनसभाएं करने का प्रयास किया, पर पुलिस-प्रशासन ने उन्हें ऐसा करने नहीं दिया। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ होने के बाद टिहरी जैसे देशी रियासतों के जन-आंदोलनों में भी उबाल आया। अगस्त में बम्बई में आयोजित अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद् के सम्मेलन में देशी नरेशों से मांग की गई कि वे ब्रिटिश साम्राज्य से संबंध विच्छेद करें और लोगों के प्रति उत्तरदायी शासन घोषित करें। वहां से लौटकर सुमन ने मसूरी में साथियों से विमर्श किया। टिहरी राजशाही को भी उत्तरदायी शासन स्थापित करने, बेगार और अन्यायपूर्ण कर समाप्त करने, प्रजामंडल को कार्य करने के अवसर प्रदान करने का मांग पत्र भेज दिया। इन्हीं मांगों को आगे बढ़ाने के लिए 10 सितंबर को कार्यकर्ताओं का एक सम्मेलन टिहरी में आयोजित किया गया। किन्तु सुमन को टिहरी पंहुचने से पहले ही देवप्रयाग में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें अन्य कार्यकर्ताओं के साथ देहरादून जेल भिजवा दिया गया। नवंबर में सुमन को अनेक अन्य साथियों सहित आगरा सेंट्रल जेल में भेज दिया गया। एक साल और 62 दिन की कैद (जिसमें से लगभग 64 दिन देहरादून में और शेष समय आगरा में) के बाद 19 नवंबर 1943 को सुमन रिहा हुए। हरिद्वार में वे अपनी पत्नी विनयलक्ष्मी से मिलने गए पर अधिकांश समय गढ़वाल में राजबंदियों के परिवारों का दुख-दर्द बांटने में लगाया। दिसंबर में उन्होंने टिहरी रियासत में प्रवेश किया और लगभग एक सप्ताह अपने गांव जौल में गुजारा।
मुझे पैसे कमाकर कब देगा सुमन
एक बार मां के चरणों में विश्राम के लिए पंहुचे तो मां ने हंसी-मजाक में कहा, “तू जब चाहे मुझसे कुछ पैसे ले जाता है। मुझे पैसे कमाकर कब देगा।” सुमन ने जवाब दिया, “मां तुझे कमा कर देने वाले तो तेरे दो अन्य बेटे हैं ही। मुझे तू उनके लिए छोड़ दे जिनका कोई बेटा नहीं है।”
सुमन को टिहरी जेल पहुंचाया
27 दिसंबर को वे टिहरी के लिए निकल पड़े, चम्बा में पुलिस ने उन्हें रोक दिया। यहीं से सुमन ने उच्चाधिकारियों को अपने सार्थक उद्देश्य के बारे में पत्र लिखा। 30 दिसंबर को उत्तर के दौरे पर पुलिस सुपरिंटेडैंट चंबा पंहुच गए और उन्हीें की बंद मोटर में श्रीदेव सुमन को टिहरी जेल के भीतर पहुँचा दिया गया। आगरा सेंट्रल जेल से छूटे हुए अभी उन्हें मात्र 41 दिन ही हुए थे। जैसे ही सुमन जेल पहुंचे उनके कपड़े छीन कर उन्हें अकेलेपन की कोठरी में बिना ओढ़ने बिछौने के फैंक दिया गया। जब उन्होंने माफीनामा लिखने से इंकार किया तो उन्हें बेंतों से पीटा गया। पैंतीस (35) सेर वजन वाली बेड़ियां उनके पैरों में डाल दी गईं। जाड़े की ठंडी रातों में उन पर बहुत सारा ठंडा पानी फेंका गया। एक सप्ताह तक यातनाएं चलती रहीं तो भी सुमन अपने पथ से तनिक न डिगे तो उनकी बेड़ियां निकाल दी गईं। फिर भी उन्हें सबसे अलग रखना जारी रखा गया और किसी से भी मिलने नहीं दिया जाता था।
3 मई 1944 को शुरू किया अनशन
जब सुमन की सभी लोकतांत्रिक मांगे अस्वीकृत होती गईं तो 3 मई 1944 को उन्होंने ऐतिहासिक अनशन आरंभ किया जो सदा के लिए विश्व के त्याग और बलिदान के इतिहास में दर्ज हो चुका है। जी हाँ, यह अनशन आरंभ होने के बाद सुमन पर अत्याचार और भी बढ़ गए। उन्हें रोज बेंतों और डंडों से पीटा जाता था, जबरदस्ती खाना खिलाने का प्रयास किया जाता था। जब यह सब कोशिशें सफल न हुईं तो उन्हें जेल अस्पताल की एक कोठरी में डाल दिया गया। यहां भी पैरों में बेड़ियां डाली गईं थीं, बेंत मारे जाते थे। सुमन की हालत दिन-प्रतिदिन बिगड़ती देखकर अधिकारियों ने उनकी बीमारी की अफवाह फैलाई। अफवाह फैलाई निमोनिया की और इंजेक्शन कुनैन के दिए जिससे सुमन की हालत बेहोशी जैसी होने लगी।आखिर 25 जुलाई 1944 को इस अहिंसक संघर्ष के पुजारी का प्राणान्त हुआ।
हमेशा याद रहेगा बलिदान
सुमन गढ़वाल के गौरव थे। उन्हें जब इतनी निर्ममता से मारा गया और इस हत्या में टिहरी की राजशाही की सीधी जिम्मेदारी थी, तो इससे लोगों का राजशाही के प्रति अन्धविश्वास तेजी से टूटने लगा और स्वतंत्रता के आंदोलन में बहुत तेजी आई। मात्र 29 वर्ष की आयु में 84 दिनों के उपवास के बाद उन्होंने टिहरी के जेल में जो शहादत प्राप्त की, उसकी कहानी ऐसे हर मौके पर दुहराई जाएगी, जब भी दुनिया में किसी महान आदर्श के किये गए बलिदानों को याद किया जाएगा।
(संकलित)
-कमलेश्वर प्रसाद भट्ट
प्रवक्ता, राजकीय इंटर कालेज, बुरांसखंडा
