वरिष्ठ कवि जीके पिपिल की एक ग़ज़ल…. नदिया प्यार की अवरुद्ध निकली रुकी निकली
जीके पिपिल
देहरादून, उत्तराखंड

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गज़ल
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नदिया प्यार की अवरुद्ध निकली रुकी निकली
जब भी आँखें सेंकनी चाहीं आग बुझी निकली।
जब कभी भी छूना चाहा हमने किसी डाली को
वो पहले ही किसी और के लिये झुकी निकली।
हमें लगा कि दिल धड़का है उसका अपने लिये
पर ये तो किसी और के लिये धुकधुकी निकली।
हमने तो जब भी इश्क़ की गाड़ी पकड़नी चाही
सब हमें छोड़कर पहले ही गुज़र चुकी निकलीं।
ग़म तो सभी जाने पहचाने से ही निकले हमेशा
बस ख़ुशी जब भी हमें मिली अज़नबी निकली।
हमने तो बहुत उम्मीद से माँगा था उनका साथ
मगर उनके दिल में हमारे लिये बेरुख़ी निकली।
केवल हम ही नहीं होते रहे परेशान उसके लिये
वो भी सदा हमारे लिये उतनी ही दुखी निकली
मत पूछ कि क्या मिला है मोहब्बत के मलबे से
कोई हसरत झुलसी कोई आरजू जली निकली।
