कवि धर्मेंद्र अनियाल ‘धर्मी’ का गढ़वाली गीत … काम धंधा नी छन, राजधानी द्वि छन!!
धर्मेंद्र उनियाल धर्मी

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काम धंधा नी छन,
राजधानी द्वि छन,
हमन त कैम बोली नी,
बोन वाला भी स्यू छन!!
ह्यूंद देहरादून मा,
गैरसैण मई-जून मा
तुम्ही बोला दीदा भूलों,
यूं भी कूई छूंई छन!!
काम धंधा नी छन,
राजधानी द्वि छन!!
कुछू तैं समझ आई नी,
कुछ तैं कैन बिंगाई नी,
सबि रूसयां नी छन,
खुश भी कूई -कूूई छन!!
काम धंधा नी छन,
राजधानी द्वि छन!!
क्वी पित्रू की जै जैकार कना,
कुई नेतों कू सत्कार कना,
कुछ तैं अभी प्रतीत नी आणू
कुछ बोना बस छूंई छन!!
काम धंधा नी छन,
राजधानी द्वि छन!!
काम धंधा नी छन,
राजधानी द्वि छन!!
द्विवया संविदा पर छन,
स्थाई अभी कूई नी छन!!
काम धंधा नी छन,
राजधानी द्वि छन!!
