शिक्षक दिवस पर विशेष: सुलोचना परमार “उत्तरांचली” की रचना … शिक्षक तुम्हारी जय हो
सुलोचना परमार “उत्तरांचली”
धर्मपुर, देहरादून उत्तराखंड

————————————————————–
शिक्षक तुम्हारी जय हो
पिछले जन्म में पुण्य
किए थे
तुम तब शिक्षक रूप धरे हो।
मानवता के लिए समर्पित
तब शिष्यों को कर पाए हो।
जय हो तुम्हारी जय हो
इस धरती के महापुरुष
सब अ… आ … तुम्ही से
सीखे हैं।
ए… बी… सी… डी…
भी तो गुरुजन
शिष्य तुम्ही से सीखे हैं।
दुनियां में व्यवहार हो कैसा
तुम ही तो बतलाते हो
जय हो………..
विद्वानों की फसल उगाई
अपने-अपने देशों में।
जमीं से लेके आसमान तक रहा तुम्हारे उद्देश्यों में।
भेजा चाँद पर ये कह करके
अब तुम अपना नाम कमाओ
जय हो ……..
हुए हैं शिष्य तुम्हारे ऐसे
जो दुनियाँ में नाम कमाये हैं।
भरत-भुमि से विश्व में देखो
धर्म ध्वजा फहराये हैं।
तुम्हारे संरक्षण में तो
नई खोज कर पाए वो
जय हो …….
डीएम, सीएम, पीएम, प्रेजिडेंट
सब तुमने ही बनाए हैं।
देश की बागडोर तभी तो
वो अपने हाथों में ले पाए हैं।
तुम्हारी ही छत्र-छाया में
ही आगे हैं बढ़ पाए वो
जय हो …………
देश प्रेम के बीज बोए जो
तब सीमा पर वो डटे हुए हैं।
अपने-अपने देश के लिए
सब सैनिक यहांँ कुर्बान हुए हैं।
तुम्हारे दिए संस्कारों से ही
देश पे मर मिट जाते हैं वो
जय हो ……………
