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पाठकों का बड़ा प्रतिशत खोया, अब इसे बचाए रखना बड़ी चुनौती: जितेन ठाकुर

दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में समकालीन कहानी की पठनीयता और चुनौतियां पर ‘संवेदना’ ने गोष्ठी का आयोजन किया। अध्यक्षता ख्यातिलब्ध साहित्यकार जितेन ठाकुर ने किया। इस अवसर पर डॉ. रजनी गुप्त अतिथि वक्ता रही।

शब्द रथ न्यूज (ब्यूरो) देहरादून। साहित्य कला और संस्कृति के लिए समर्पित संस्था ‘संवेदना’ की ओर से सोमवार को दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के सहयोग से दून पुस्तकालय के सभागार में कहानी विधा से संबंधित विषय ‘समकालीन कहानी की पठनीयता और चुनौतियां’ पर गोष्ठी आयोजित की गई। इस अवसर पर डॉ. रजनी गुप्त के उपन्यास/कहानी पुस्तक ‘आलापचारी’ का लोकार्पण भी किया गया।

गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए जितेन ठाकुर (उत्तराखंड राज्य सरकार की ओर से साहित्य भूषण सम्मान से सम्मानित) ने कहा कि पठनीयता किसी भी रचना की रीढ़ होती है, जिसके सहारे रचना एक पाठक से दूसरे पाठक तक और फिर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती है। यह सच है कि हमने पाठकों का बड़ा प्रतिशत खोया है। लेकिन, फिर भी आज हमारे पास पाठक हैं और इसे बचाए रखना बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि प्रायोजित चर्चाओं ने साहित्य का अहित किया है। इन सब चुनौतियों के बीच ही समाज में कहानी विधा को समाज के लिए उपयोगी बनाते हुए इन चुनौतियों से निरंतर जूझना और पार पाना हर कहानीकार के लिए व्यक्तिगत स्तर पर और साहित्यिक संस्थाओं को सामूहिक स्तर पर लेखन से भी पहले की पहली जरूरी शर्त है ।

अतिथि वक्ता डॉ. रजनी गुप्त ( ‘कथाक्रम’ पत्रिका लखनऊ की उप संपादक) ने कहा कि समकालीनता विशेष कालखंड का द्योतक है, जिसमें आज के जीवन का यथार्थ हो अर्थात सीधे-सीधे वास्तविक जीवन से सहजता से जुड़ाव महसूस हो। आज की इस कहानी में इस तरह से विषयों की विविधता शामिल हो, जिसे पढ़ते हुए पाठक को अपना समूचा जीवन नजर आए। कहानी में ऐसे नए विषयों को लिया जाए, जिसमें दिन-ब-दिन जटिल होते जा रहे रिश्तों और जीवन के बहुआयामी संबंधों से मुठभेड़, पढ़कर जीने का हौसला जगे। विषय बेशक नए हों। लेकिन, थीम को रचने गढ़ने में इतनी दुरूहता न हो, जिसे आम पाठक समझ ही न सके। जैसे गीतांजलि श्री का बुकर पुरस्कार प्राप्त उपन्यास ‘रेत समाधि’ है, क्योंकि इस तेज रफ्तार दौर में आज समय की कमी है। रचनारत कई पीढ़ियों के लेखक मौजूदा दौर के बहुरूपिया प्रहारों व बाजार से उपजी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। बेशक कहानियों का खूब प्रकाशन हो रहा है। लेकिन, पाठकों की संख्या में इसने इजाफा किया हो ऐसा कहना मुश्किल है। इसके बरबक्श सामान्य पाठक कई बार एक जैसे होते जा रहे, उसके पाठ से ऊबने की शिकायत भी करते हुए देखे जा सकते हैं।

नए शिल्प को पाने की जद्दोजहाफ़ से जूझ रहे हैं लेखक

डॉ. रजनी गुप्त ने कहा कि अपने-अपने हिसाब से तय लगभग दो दशक के जीवन को रचनाओं में समेटना मुश्किल है। क्योंकि, आज कहानीकारों की कई पीढियां एक साथ सक्रिय हैं। समकालीन कहानी में तीन पीढियां के लेखक सृजनरत हैं। आम पाठक किसे पढ़े किसे न पढ़े , पढ़ने का हासिल क्या रहा, ऐसे सवाल जरूरी हैं। आज के दौर में पठनीयता के दबाव का सामना करने और नए शिल्प को पाने की जद्दोजहाफ़ से हर लेखक जूझ रहा है। इतना ही नहीं जिन लोगों का रचनाकाल कुछ दशकों तक फैला है, उन्होंने भी अपनी सीमाओं का अतिक्रमण किया है । कई बार नव्यता के अति उत्साह में कुछ युवा लेखक अपनी ही शैली के दोहराव के शिकार होकर अल्प अवधि में ही पुराने पड़ते गए यानी मोनोटोनस हो गए। हिंदी कहानी के समकालीन परिदृश्य में दोनों ही तरह के उदाहरण आसानी से देखे जा सकते हैं।

स्वागत के साथ हुआ गोष्ठी का शुभारंभ

गोष्ठी का प्रारंभ दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के समन्वयक चंद्रशेखर तिवारी की ओर से सभी उपस्थित सदस्यों के स्वागत के साथ किया गया। संवेदना संस्था के संयोजक समदर्शी बड़थ्वाल ने संवेदना संस्था के कार्यों की जानकारी दी। कहा कि संस्था पिछले पांच दशक से अधिक समय से देहरादून में साहित्य कला और संस्कृति के क्षेत्र में निरंतर योगदान दे रही है। हर महीने के प्रथम रविवार को संवेदना की पहली गोष्ठी होती है, जिसमें रचनाकार अपनी अप्रकाशित रचनाओं को संवेदना के साथियों के समक्ष रखता है और उस पर उनकी राय ली जाती है, जिससे उसका परिमार्जन किया जा सके । कला, संस्कृति और समसामयिक सामाजिक मुद्दों पर भी संवेदना की ओर से विभिन्न कार्यक्रमों और जन आंदोलनों, सामाजिक कार्यों में निरंतर सहभागिता की जाती रही है।

वरिष्ठ साहित्यकारों की रही मौजूदगी

गोष्ठी में चंद्रशेखर तिवारी, निकोलस हॉफलैण्ड, सुंदर सिंह बिष्ट, डॉ. जितेंद्र भारती, डॉ. राजेश पाल, डॉ. आशुतोष सिंह, शशिभूषण बडोनी, डाॅ. लालता प्रसाद, डॉली डबराल, सुधा थपलियाल, डॉ इंदु पांडे, सुधा जुगरान, सरोजनी नौटियाल,यामा शर्मा, नीलम्प्रभा वर्मा, निशा अतुल्य, रजनीश त्रिवेदी, शिवमोहन सिंह, संजीव घिल्डियाल, कुसुम भट्ट, डॉ. घनश्याम सिंह, तन्मय ममगाईं सहित अन्य साहित्यकार मौजूद रहे। संचालन डॉ. विद्या सिंह ने किया

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