कवि चन्द्र कुँवर बर्त्वाल की जयन्ती पर विशेष: कवि का अपने आप में एक सुंदर कविता होना पहली शर्त
हिमालय के प्रसिद्ध कवि चन्द्र कुँवर बर्त्वाल की जयन्ती पर वरिष्ठ साहित्यकार हेमचंद्र सकलानी का बर्त्वाल के व्यक्तित्व व कृतित्व पर प्रभावशाली आलेख।
हेम चंद्र सकलानी
विकासनगर, उत्तराखंड

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चन्द्र कुंवर बर्त्वाल हिन्दी कविता साहित्य के एकमात्र ऐसे कवि कहे जा सकते हैं, जिन्होंने हिमालय, प्रकृति, पर्यावरण के साथ मनुष्य मन की खूबसूरत संवेदनाओं भावनाओं को अपनी कविताओं में भरपूर जिया है। यही कारण है कि हिन्दी कविता साहित्य की दहलीज पर उनकी कविताएं किसी खूबसूरत महिमामण्डित हिम शिखर की तरह अपनी बेहद सुंदर उपस्थिति दर्ज कराती हैं। हिमालय, प्रकृति के प्रति शब्दों के साथ कल्पना तथा भावों का जितना सुंदर सम्मिश्रण उनकी रचनाओं में देखने को मिलता है, उतना अन्य किसी की कविताओं में नहीं मिलता। कहा जा सकता है कि हिन्दी काव्य साहित्य के व्योम को उन्होंने प्रकृति के विभिन्न रंगों की सुंदरता से जैसे भर दिया हो। रचनाओं को पढ़ते हुए भावों के सौंदर्य के मोहजाल में पाठक स्वयं बंधता चला जाता है।
अपनी कविताओं में प्रकृति और हिमालय को सबसे खूबसूरत ढंग से रेखांकित करने वाले कवि चन्द्र कुंवर बर्त्वाल का जन्म 20 अगस्त 1919 में रूद्रप्रयाग के मालकोटी गांव में भूपाल सिंह बर्त्वाल (स्कूल में प्रधानाध्यापक) के घर हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा नागनाथ और पौड़ी में हुई थी। डीएवी से इंटर तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से बीए पास करने के बाद लखनऊ विश्वविद्यालय में एमए में प्रवेश लिया ही था कि क्षय रोग से ग्रसित होकर पांवलिया लौट आये। जहॉ उन्होंने प्रकृति के सान्निध्य में अनेक उत्कृष्ट रचनाओं को जन्म दिया। तब विशाल भारत, चांद, सरस्वती, प्रतीक, क्षत्रीयवीर जैसी प्रसिद्व पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं प्रकाशित हुई थी।
इसमें कोई संदेह नहीं कि जिसका मन, आत्मा सुंदर व पवित्र हो, जो समस्त स्वार्थों, बुराईयों से दूर हो, केवल उसी कवि की रचनाएं सुंदर होती हैं। इस दृष्टि से यदि चन्द्रकुंवर की रचनाओं को देखें तो चन्द्र कुंवर एक बेजोड़ किस्म के व्यक्ति व कवि नजर आते हैं। जिस तरह दो व्यक्तियों की उंगलियों की छाप नहीं मिल सकती है, उसी तरह चन्द्र कुंवर से मिलता-जुलता कोई अन्य कवि दिखाई नहीं पड़ता। उनकी थोड़ी सी रचनाओं को पढ़ने का अवसर मिला तब महसूस हुआ चन्द्र कुंवर, जैसे कोई व्यक्ति नही थे वरन् वह स्वयं, उनकी आत्मा, उनका मन, उनकी कल्पना, उनकी सोच, अपने आप में ही एक खूबसूरत कविता है। कौन सी कविता सर्वश्रेष्ठ है तय नहीं किया जा सकता। पहाड़ और प्रकृति उन्हें कविता की ओर आने को विवश करते हैं, यही विवशता उनकी रचनात्मकता की आवश्यकता बन जाती है। उनकी कविताएं हिमालय तथा उसकी प्रकृति की प्रेम की साक्षी रही हैं। निःसंदेह डा उमा शंकर सतीश ने कुछ सोच कर ही, अपनी पुस्तक ”चन्द्र कुंवर बर्त्वाल का कविता संसार” का प्रारंम्भ चन्द्र कुंवर की इस रचना से किया-
‘अब छाया में गुजन होगा वन में फूल खिलेंगे।
दशा-दिशा से अब सौरभ के धूमिल मेघ उठेंगे।
जीवित होंगे वन निंद्रा से निद्रित शैल जगेंगे।
अब तरूओं में मधु से भीगे कोमल पंख उगेंगे।’
सुमित्रा नन्दन पंत को तो यह पंक्तियां लिखनी पड़ी थीं-
‘छोड़ द्रुमों की मृदुल छाया तोड़ प्रकृति से भी माया
बाले तेरे बाल गाल में कैसे उलझा दूं मैं लोचन।’
सच तो यह है कि चन्द्र कुंवर बर्त्वाल इस तरह प्रकृति की सुंदरता में आत्मसात हो गये थे कि बिना कहे, लिखे ही वह यह कह गये। कुछ बुद्विजीवी उन्हें छायावादी कवि मानते हैं तो कुछ नहीं। लेकिन, यह सभी स्वीकारते हैं कि उस समय छायावाद अस्ताचल की ओर था। ऐसे में छायावाद का प्रभाव चन्द्र कुंवर की रचनाओं पर पड़ना स्वाभाविक था। इस दृष्टि से डा. उमा शंकर सतीश की टिप्पणी सटीक प्रतीत होती है- ‘चन्द्र कुंवर की रचनाओं में छायावादोत्तर काव्य चेतना व भारतीय चिंतनधारा की अभिव्यक्ति हुई है।’ चन्द्र कुंवर ने प्रकृति, हिमालय, मेघ, पवन, वेदना तथा दुख, मृत्यु के पूर्वाभास को बिम्ब बनाकर अधिकतर रचनाएं लिखीं हैं। अधिकतर बुद्विजीवियों का मानना है कि कालिदास के बाद यदि किसी ने इतना अधिक हिमालय पर लिखा तो वह चन्द्र कुंवर बर्त्वाल हैं। क्योंकि हिमालय की सुंदरता, पवित्रता, शुद्व पर्यावरण, फल, फूल, नदियां, मेघ, वन खूबसूरत हिम से आच्छादित शिखरों के भण्डार के साथ जितना मोहक है, उतना ही मानव हितकारी भी है। वे इन्हें ईश्वर का रूप मानते हैं और सबसे इन्हें पूजने का अनुरोध करते हैं। भावों की इतनी सुंदर अभिव्यक्ति अभी तक किसी अन्य रचना में देखने को नहीं मिलती है-
”जाओ मेघों के भीतर गिरि के शिखरों पर, देव पूजने रंग-बिरंगे वस्त्र पहन कर
हाथों में धर कर अक्षत धूप दीप चंदन, जाओ ऐ सब मधुर स्वरों में गाते वंदन
उस सुर का जो सबका करता वन में रक्षण।”
एक सफल कवि की यह विशेषता होती है कि उसके पास ऐसी दृष्टि होती है जिससे वह अपने आसपास के वातावरण, दृश्य, प्रकृति, के अतिरिक्त स्वयं की अनुभूतियों की तह में जाकर अपनी स्पर्शी छमता, संवेदना के द्वारा उससे जुड़ कर संवाद करता है, फिर कलम के माध्यम से उसे अभिव्यक्ति देता है। यह अभिव्यक्ति ही कविता में परिवर्तित हो जाती है। इसीलिए कहा जाता है कविता कभी झूठी, भददी, कुरूप, अशुभ, अहित सोचने वाली नही होती। कविता का सत्य, निर्मल, शुभ्र, सुंदर रूप उसे सत्यं शिवं सुंदरं के निकट लाता है। वैसे भी ईश्वर की सारी सुंदर प्रार्थनाएं, अर्चनाएं, आराधनाएं, पूजाएं, मंत्र, पवित्र मंत्रोचारण कविताओं के रूप में ही बोली, पढ़ी, गायी जाती हैं। स्वयं चद्र कुंवर का एक खूबसूरत, पवित्र, भावुक, कोमल हृदय रहा है। यह इसी बात से पता चलता है कि इतना सुंदर लिखने के लिए स्वयं भी इतना सुंदर सोचना, दिखना और बनना पड़ता है। यदि उनकी मानसिकता स्वार्थ, लोलुपता, लालच, राजनीतिक, जोड़-तोड़ वाली होती, यदि सिर्फ कुछ पाने की होड़ में रहने वाली होती, तो ऐसी रचनाएं कभी भी साहित्य को नहीं दे पाते। सच तो यह है कि प्रकृति, पहाड़ उन्हें अपनत्व से बांधते हैं तभी तो सजीवता पूर्वक इन्हें अपनी कविताओं में उतार पाये हैं। उनका मन कहॉ जाकर रमता है देखें-
”मैंने जीवन भर पर्वत ही पर्वत देखे/दुर्गम बर्फानी उजाड़ हिम धाम सरीखे/
उठते गिरते पथ का ही क्रम मैंने जाना/हिम शिखरों को नयनो ने सीखा अपनाना/
गंगा गिरती है मेरे गिरी के शिखरों से/मैंने जीवन भर पर्वत ही पर्वत देखे।”
उनकी कविताओं की यह विशेषता रही है कि पढ़ने वाला चाहता है कि कविता का अन्त ही न हो वह बहती रहे निरंतर। चन्द्र कुंवर की वर्णन शैली की सरलता, मोहकता, स्वच्छता, प्रौढ़ता, निर्मलता उनके सच्चे कवित्व की पहचान है। प्रकृति के सुंदर दृश्य, हिमालय का, पर्यावरण का वर्णन, मानव हृदय की कोमल अनुभूतियों, भावनाओं, संवेदनाओं की गहराई, जो उनकी रचनाओं में दिखाई पड़ती है, वह रचनाशीलता उनको हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठतम कवियों की श्रेणी में स्थान दिलाने को पर्याप्त है। उन्होंने प्रकृति को किस तरह से अपने जीवन से जोड़ा है-
‘जीवन ने मुझको प्रभात की भांति खिलाया, आशाओं ने मुझको कुसुम की भांति हंसाया,संध्या ने कर दिया चकित मुझको शोभा से, स्निग्ध मरण ने मुझको निशा की भांति सुलाया।’
आज का कवि चाहता है बहुत कुछ, मगर चन्द्र कुंवर पहाड़ में जन्मे, उसकी प्रकृति में पले, उसी के हो कर रहना चाहते थे तभी तो उनका भोला-भाला, सीधा-साधा निर्मल कवि मन चाहता है सिर्फ-
‘मुझे इसी में है सन्तोष, हिमगिरि में छोटा सा घर हो,
धूप सेंकने को दिनभर को, एक सुखद आंगन हो,
जिसमें बहती रहे हवा निर्दोष, चाह ना हो कुछ भी पाने की,
डर न हो किसी के खो जाने का।’
उनके पूरे कविता साहित्य में पहाड़, प्रकृति, पर्यावरण, मेघ, नदियॉ, वृक्ष, मानवीय संवेदना के भाव हर शब्द में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से अभिव्यक्ति देते नजर आते हैं। उत्तराखण्ड में रहने वाले तो हर क्षण इनके सान्निध्य में व्यतीत करते हैं इस कारण हमारे लिए इनका महत्व शायद इतना न हो लेकिन, अन्य प्रदेश के लोग उनकी रचनाओं का अध्ययन करेंगे तो हिमालय उसकी प्रकृति के प्रति उनमें आस्था, श्रद्धा, आशा, विश्वास, आकर्षण, प्रेम और अधिक बढ़ेगा। भला कौन पढ़ने वाला होगा जो उनकी निम्न पंक्तियों को पढ़ने के बाद दौड़ता हुआ हिमालय को स्पर्श करने न चला आये-
अब कुछ दिन के बाद पर्वतों के शिखरों पर
अपनी कविता के नव देवदार के वन में
मिला हुआ होगा कुछ ऊॅचे गिरि से अंबर
मस्तक पर कर मलय प्रभव चंदन का लेपन
करो जला कर धूप दीप तरुवर का पूजन।
नीला देवदार का वन है/जिस पर मोहित हुआ पवन है।
जिसके नीले शिखरों पर बसते बादल /कभी विचरते देवदारु वन की पलकों पर।
है मुझे याद वह पेड़ चीड़ का सुंदर रह कर दिन भर जिसके तल पर
हम ऑखों में ऑसू भर कर, होते थे विदा डूबते दिन कर।
जीवन चाहे कितने कष्टों, दुखों में हो, चाहे कितनी सुख सम्पन्नता में हो पर जीवन वही सुंदर होता है जो सत्यं, शिवंम, सुंदरम के निकट होता है तभी तो वह कष्ट में भी कह उठते हैं- ‘कष्टों से यद्यपि जर्जर था फिर भी जीवन सुन्दर था।’
उनकी लम्बे जीवन, युग-युग तक जीने की चाह न थी, पर जितनी थी ऐसी थी-
‘मैं न चाहता युग युग तक पृथ्वी पर जीवन,
पर उतना ही जी लूं जितना जीना सुन्दर हो।’
इस सुन्दरता को उन्होंने हिमालय, उसकी प्रकृति उसके पर्यावरण में देखा।’ निःसंदेह ऐसी रचना वही लिख सकता है जो हिमालय के निकट उसकी खूबसूरत प्रकृति के सान्निध्य मे रहा हो। मृत्यु निश्चित है पर आशा का अंत भी नहीं। तभी तो कवि इस सत्य को उजागर करता है, इन पंक्तियों में-
‘मैं मर जाऊंगा पर मेरे/जीवन का आनन्द नहीं/
झर जावेंगे पग कुसुमतरू/पर मधु प्राण बसंत नहीं
सच है घनतम खो जाते/रितु बसंत हेमंत नहीं/
पर प्राची से झरने वाली/आशा का अंत नहीं।’
बैठकर फिल्मी गीत लिखे जा सकते हैं, कहानियां लिखी जा सकती हैं, कविता नहीं। अपने हृदय की संवेदनशीलता के कारण आसपास के वातावरण को जब कवि अपने अंदर तक स्पर्श करता है, तब उसकी सुकुमार भावनायें, संवेदनशीलता, शब्दों के परिधान पहनने लगती है और वह अभिव्यक्त होकर कविता के रूप में धीरे-धीरे बहने लगती है। उनका जीवन कष्टों, दुखों से भरा पड़ा था लेकिन गीतों में उन्होंने हमेशा आशा, आस्था, विश्वास को जिंदा रखा। उनकी कविताओं में संवेदनाएं महकती, सुगंध बिखेरती सी नजर आती हैं। उनके आशावादी व्यक्तित्व का एक पहलू यह भी था-
‘मेरी नदी स्वयं अपने पथ को खोजेगी,
वह सूखे पथ को फूलों से भर देगी।’
वासुदेव शरण अग्रवाल ने कितना सही कहा है, उनके बारे में -चन्द्र कुंवर की कविताएं उनके जीवन की आत्मकथाएं हैं। मृत्यु का अहसास भी उन्हें प्रकृति से जरा भी विमुख न कर सका, वे उसी तरह प्रकृति का गुणगान करते हैं-
आयेगा बसंत पर मैं न हरा अब होऊंगा,
गरजेगा सावन मैं उसके स्वर न सुनूंगा
होंगे इतने उत्सव इन राहों के ऊपर,
जायेंगी इतनी छाहें सुख से सजधज कर,
होंगे इतने प्रातः न मैं अब कुछ देखूंगा
आयेगा बसंत पर मैं न हरा अब होऊंगा।
चन्द्र कुंवर की रचनाओं के बारे में गोविंद चातक की पंक्तियां बड़ी प्रभावी बन पड़ी हैं-‘मृत्यु के करूण अहसास, प्रकृति की सुमधुर छाया में बिताए गए जीवन की संवेदना ने उनके काव्य को ऋषियों जैसी पावन सौम्यता प्रदान की।’ उनकी कविताएं, कविताएं कम, उनका जीवन दर्शन अधिक प्रतीत होती है। जिस प्रकार कालिदास और उनकी रचनाओं के बारे में लिखने को शब्द तलाशनें पड़ते हैं, ठीक उसी तरह चन्द्र कुंवर बर्त्वाल की रचनाओं के बारे में कुछ कहना, लिखना कोई आसान कार्य नहीं कहा जा सकता। उन्होंने हिमालय से लेकर प्रकृति, पर्यावरण की सुंदरता से लेकर जीवन-मृत्यु के अहसास सभी पर उत्कृष्ट रचनाएं लिखीं। हिमालय के प्रति, प्रकृति के प्रति उनकी कविता के भाव उनकी व्यापक सोच और व्यापक दृष्टि को अभिव्यक्त करते हैं। कालिदास का अहसास ही उन्हें पंक्तियां लिखने को विवश करता है-
‘एक रात देखा था मैंने हिमगिरी के ऊपर,
कालीदास थे बैठे ऑखों में ऑसू भर कर।’
निःसंदेह हिमालय पर प्रकृति के विभिन्न रूपों पर जिस तरह चन्द्र कुंवर ने लिखा वैसा किसी अन्य ने नहीं लिखा। बहुत कम रचनाकार ऐसे होते हैं, जिनकी रचनाओं में शब्दों में रिद्म के साथ-साथ भावों का खूबसूरत रिद्म भी मिलता हो। चन्द्र कुंवर की रचनाओं में हमें दोनों तरह का रिद्म देखने को मिलता है। प्रकृति के अनन्त रूप हैं जैसे ईश्वर के। उसकी उपासना करते लगता है जैसे चन्द्र कुंवर भी ईश्वर की उपासना में लीन रहे हैं। पंवालिया में मंदाकिनी के तट पर लिखी कविता मंदाकिनी के प्रति छलकता उनका स्नेह, भला किसके दिल को नहीं स्पर्श नहीं करेगा-
‘मेरे गृह को छू कर निश दिन बहने वाली
हे अरमों के नन्दन वन से आने वाली मन्दाकिनी
शिला पर तुम्हारी छवि को निश्च्छल पीने की इच्छुक ऑखों के आगे
रूको रूको तुम, प्रबल बेग से दिशा दिशा को।’
सुंदरता, आशा, संवेदना, विषाद, अभाव, कुण्ठायें, स्नेह जैसे सब का घर चन्द्र कुंवर का शरीर था। हर कोई अपनी मृत्यु अपने गांव में चाहता है। मृत्यु को पास देख कर भी वह अपने हिमालय उसकी प्रकृति, उसके पर्यावरण से दूर नही रह सके, अपने घर पांवलिया लौट आये थे और अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक जीवन के लिए संघर्ष करते रहे तथा कविता कर्म को धर्म मान कर पूरा करते रहे वह मृत्यु से घबराये नहीं। निरन्तर संघर्ष और मृत्यु का अहसास उनकी कविताओं में ऐसे उतरता है-
‘नहीं शांति से मुझे न रहने देगा मानव, दूर वनों में सरिताओं के शीत तटों पर
सूनी कामाओं के नीचे लेट मनोहर, विहगों के स्वर मुझे न सुनने देगा मानव।’
‘मेरे शरीर का वह चाहे, टुकड़े-टुकड़े कर डाले
पर मै अपना सिर जालिम के पैरों पर नहीं झुकाऊंगा
यह जान चली जाये तो है मुझको इसकी परवाह नहीं
मैं या तो विजयी होऊॅगा या लड़ता मारा जाऊॅगा।’
‘अपने उद्गम को लौट रही, अब बहना छोड़ नदी मेरी।
छोटे से अणु में डूब रही अब जीवन की पृथ्वी मेरी।’
जो प्रकृति हमें मॉ की तरह पालती पोषती है, उसको आज हमने साहित्य से क्या जीवन से ही शायद पृथक कर दिया है। आधुनिकता, भौतिकवादी सुखों की चाह में भागते हुए हम पूरी तरह विस्मृत कर गये हैं कि प्रकृति और जीवन से ही सौंदर्य उत्पन्न होता है। पृथ्वी को, मानव जीवन को, हिमालय को उसके पर्यावरण, वनों, नदियों, मेघों तथा उससे सम्बधित चीजों ने जो सुंदरता प्रदान की वह और किसी चीज से प्राप्त नहीं हो पायी। चन्द्र कुंवर के कविता साहित्य में पृथ्वी, पहाड़, प्राकृतिक परिवेश, मौसम, श्रृतुएं, पर्यावरण के साथ मानवीय मन की सुंदर संवेदनाएं हैं, जीवन की सुंदरता है, धड़कन है जो सब मिलकर किसी इन्द्र धनुष का अहसास कराते हैं। निःसंदेह सत्यं शिवं सुंदरम का साक्षात कराती सी लगती हैं उनकी रचनाएं। कविता क्रिकेट का मैच नही होती, वह परचुनी या शराब की दुकान भी नही, न ही राजनीति की चौपाल, संसद, न ही नेताओं का भाषण या राजनीति का खेल। यह सततः साधना है, तपस्या है जो अनुभूतियों, अनुभवों, स्पर्शों की गहरी संवेदना से प्रकट होती है। हिमालय, प्रकृति, पेड़, पवन, पर्यावरण प्राचीन काल से देवतुल्य रूप में पूजे जाते हैं। चन्द्र कुंवर की रचनाएं भी इन सब की साक्षी कही जा सकती हैं।
डा. उमाशंकर सतीश, श्री बुद्वि बल्लभ थपलियाल, शम्भू प्रसाद बहुगुणा तथा डा. योगेम्बर सिंह बर्त्वाल ने तो उनके सम्पूर्ण जीवन के एक-एक क्षण को (चन्द्र कुंवर बर्त्वाल का जीवन दर्शन)” पुस्तक में संजोकर तथा चन्द्र कुंवर बर्त्वाल की रचनाओं को संकलित और प्रकाशित कर, जो पुनीत कार्य किया है, उसकी जितनी प्रशंसा की जाये उतनी कम होगी। निःसंदेह चन्द्र कुंवर की रचनाएं हिन्दी कविता साहित्य में मील का पत्थर हैं। चन्द्र कुंवर बर्त्वाल, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रा नन्दन पंत, महादेवी वर्मा के लगभग समकालीन रहे थे। किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में समय, काल परिस्थितियां, वातावरण अह्म भूमिका निभाते हैं। इलाहाबाद सरिताओं का प्रयाग तो है ही, मगर वह साहित्य के तीर्थ साहित्य प्रयाग के नाम से भी प्रसिद्व रहा है। पंत, निराला, महादेवी वर्मा को हिन्दी साहित्य के आकाश में प्रदीप्त होने में, प्रयाग के परिवेश ने सहायता न की हो संभव ही नहीं है। यदि चन्द्र कुंवर प्रयाग में निवास करते तो उनको, उनकी रचनाओं को इन तीनों से कम प्रसिद्वि-लोकप्रियता न मिलती। मगर अब भी समय है कि हम उनकी रचनाओं को जन-जन तक पहुॅचाए, पाठ्यक्रमों में शामिल करें। अंत में डा. योगेम्बर सिंह बर्त्वाल ने सही कहा है- हिमवंत का कवि का पर्यावाची शब्द यदि खोजा जाये तो वह चन्द्र कुंवर ही होगा। सौंन्दर्योपासना में वे हिन्दी के रवीन्द्र नाथ टैगोर हैं तो वेदना में हिन्दी के शैली हैं। अब भी समय है कि उनकी रचनाओं को जन-जन तक पहुॅचाने के प्रयास किये जायें और उन्हें स्कूलों, कालेजों में पाठय क्रमों में शामिल किया जाये।
सम्पर्क- सकलानी साहित्य सदन, विद्यापीठ मार्ग, विकासनगर (देहरादून)।
