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वरिष्ठ कवि जीके पिपिल की एक ग़ज़ल… कुछ और रखो ना रखो प्यार बरक़रार रखना

जीके पिपिल
देहरादून, उत्तराखंड

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कुछ और रखो ना रखो प्यार बरक़रार रखना
नज़रें झुकें नहीं झुकें दिल में नमस्कार रखना।

ज़िंदगी मान से जीने के लिये भूखे तक रहना
मगर भूल से भी नहीं किसी का उधार रखना।

ख़ालिस उसके उजाले पर ही यक़ीन मत कर
चराग को परखना है तो कुछ अंधकार रखना।

उल्फ़त में उसके एहसान को चुकाने के लिये
अपने पर जानबूझकर उसके उपकार रखना।

इश्क़ करना हो तो कुछ ऐसे अंदाज से करना
ख़ुद भी बेक़रार रहना उसे भी बेक़रार रखना।

जिसके काम तुम हमेशा बेवक़्त आते रहे हो
उससे अपने काम की उम्मीद सौ बार रखना।

इस तरह से तो ताल्लुक़ात ज़्यादा नहीं रुकेंगे
कि खिड़की खुली और बीच में दीवार रखना।

तुम्हें कभी दरबार में या दरगाह में जाना पड़ा
तो पैरों में जूतियाँ और सर पर दस्तार रखना।

आज कल शेर भेड़ियों की शक्लों में घूमते हैं
इनसे बचने के लिये ख़ुद को ख़बरदार रखना।

आज तो प्यार करने की मोहलत ऐसे है जैसे
ख़रीदने पर पाबंदी और खुला बाज़ार रखना।

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