गांधी मात्र मानव या महापुरुष नहीं बल्कि एक विचारधारा हैं
गाँधी जंयती पर कहना चाहूंगी कि मैं इस दिन को एक आत्म विरेचन मतलब आत्मा के शुद्धीकरण और मंथन के रूप में लेती हूँ। क्योंकि गाँधी मात्र एक मानव व महापुरुष नहीं थे बल्कि वो एक विचार धारा थे, एक चेतन जीवन धारा में सजीव प्रवाह थे।
गाँधी हमारे अन्तर्मन की तहों में बनावट, दिखावे और पाश्चात्य सभ्यता की धूल को धुलती हुई निर्मल गंगा का जल थे। यदि कहीं हमारे मन में स्व का भाव है ( स्वदेशी , स्वभाषा , स्ववस्तु , स्वावलम्बंन) तो गाँधी प्राण वायु से तब बह रहे हैं। माना चरखे में खुद सूत कातता हुआ स्वाभिमान का भाव है गाँधी। उनके वो ऎनक दुनियाँ को आईना दिखा रहे हैं कि हम अपने हिन्दुत्व पर गर्व करते हैं। हमें जरूरत ही नहीं पश्चिम से आयी हुई हवा की। हमारे वातावरण में वो जान, वो महक विद्यमान है जिसमें हम एक स्वस्थ , सजीव और सुन्दर जीवन जी सकते हैं।
मुझे याद आ रहा है किसी ने मुझसे बहुत पहले ये बात कही थी कि अंग्रेजी नहीं आती है तो किस डॉक्टर ने कहा है कि आनी जरूरी है। उसके लिए हीनभावना रखने की जरूरत क्या है। अच्छी लगी मुझे उनकी ये बात.. मैं सोचती हूँ कि क्यों हमने अपने पढ़े-लिखे होने का सिंबल किसी विदेशी भाषा को बना रखा है ???? अगर मेरी अनपढ़ सासू माँ टीवी सीरियल देखकर अंग्रेजी को समझ सकती हैं। यदि हम पढ़-लिख कर इसे बोलने समझने लगे तो क्या इसमें इतना बहने की क्या जरूरत है। कहने का अभिप्राय यह है कि गाँधी हमारे आचरण में हैं .. गाँधी हमारी सोच में हैं, गाँधी हमारे स्वाभिमान में हैं…वो स्वाभिमान, जिसमें हम पूर्ण रूपेण हिन्दुत्व को समझते हुए कहें कि हाँ मुझे गर्व है कि मैं हिन्दूं हूँ.. भारतीय हूँ।
जय हिंन्द।
ज्योत्स्ना जोशी
