सावन की खीर … प्रतिभा की कलम से
सावन की झमाझम बारिश में जब हर तरफ हरी मुलायम घास की प्रचुरता हो जाती है तो गाय-भैंसों की दूध देने की क्षमता में भी नैसर्गिक वृद्धि होने लगती है। दही,मट्ठा बनाने, यूं ही पीने या चाय में भरपूर डालने के बाद भी दूध इतना और शेष रह जाता है कि दूध का पतीला खाली होने का नाम न ले। अथाह दूध का अच्छा सदुपयोग करने के उद्देश्य से ही शायद इस माह में हर घर में खीर बनाने की परंपरा जुड़ गई । इसलिए बिन कहे इसमें यह रिवाज भी जुड़ गया कि जिस घर में दुधारू पशुओं की संख्या कम हो या उस वक्त ना हो तो उस घर में गाँव में अन्य घरों के लोग खुद ही दूध पहुंचा आते थे कि सावन की खीर बनाकर खा लीजिएगा। लोहार, हल जोतने वाले, ढोल बजाने वाले परिवारों के लोग भी गोधन से संपन्न सवर्ण लोगों को साधिकार ताकीद कर जाते कि कल हमारे यहां खीर बनेगी, दूध का इंतजाम हो जाए ! और वाकई इंतजाम भरपूर किया भी जाता था। इस पर भी अगर थोड़ी कमी रह गई तो उलाहना तैयार रहता था कि खीर है, कोई चाय नहीं जो इतने से काम चल जाएगा। खालिस दूध की तरह दिलों में मोहब्बत भी खालिस हुआ करती थी तब। डोलची में मुंह तक दूध उड़ेल कर गिला करने वाले का शिकवा धुला करता था। सावन के खीर की इसी मीठी परंपरा की जानकारी मुझे मेरी माँ ने दी थी ।
ससुराल जब आई तो सावन में तीज पर हरी चूड़ियां बिंदी, मेहंदी, हरे वस्त्रों की भेंट देने के साथ ही माँ जी यानी सासू माँ ने कहा कि आज सावन की खीर भी बनेगी। गढ़वाली परिवारों में तीज मनाने का रिवाज नहीं, मगर माँ जी का मायका लखनऊ में है तो वहाँ का बेहतरीन सावन यहाँ देहरादून में याद करते हुए उन्होंने अपनी बहुओं को विरासत में तीज का त्योहार भी सौंप दिया है। खीर तो यूं कभी भी बन जाती है, लेकिन जब कोई चीज परंपरा से जुड़ी हो तो वह प्रसाद समान हो जाती है और अधिक स्वादिष्ट लगने लगती है। इसलिए सावन में उन दोनों बुजुर्गों की दी हुई खीर वाली परंपरा को मैं भी निभाती चल रही हूं ।
खीर पकाने और बारिश में भीगने के अलावा सावन में और कोई परंपरा निभाने का मन मैं बना नहीं पाई। जैसे, सोमवार के व्रत रखना या शिवलिंग पर दूध चढ़ाना वगैरह।
हां, एक मंदिर में हम हर मंगलवार को हनुमान जी का प्रसाद चढ़ाने जाते थे। सावन में एक दिन वहां के पुजारी जी ने हमसे कहा कि सावन माह का भंडारा है, आप खीर के लिए दूध का इंतजाम करवा दें। सोचा कि अपने परिवार के लिए तो बनती ही है। इस बार और भी बहुत से लोगों के लिए बन जायेगी, इसलिए मैंने हामी भर ली और भरपूर मात्रा में दूध मंदिर में पहुंचवा दिया। उससे पहले भी भंडारे के लिए दान मांगने वाले जब-जब आए हैं तो मैंने जितना उन्होंने मांगा उतना दान दिया है। क्योंकि मैं सोचती थी कि भंडारे में जितने गरीब जीम सकते हैं, उतने गरीब मेरे घर में कहां जुट पाएंगे ? और मैं भी कहां इतना पका पाऊंगी ? बेहतर है भंडारे में ही जी भर दान दे दिया जाये। लेकिन, जब दूध का विपुल भंडार देखकर पंडित जी अत्यंत भाव-विभोर हो गए तो उन्होंने कई-कई बार हाथ जोड़कर मनुहार की कि आप भी भंडारे में जरूर शामिल हों।
बात मानकर मैं चली गई भंडारे में। देखती क्या हूं कि उधर से गुजरने वाली सड़क पर जाने वाले वाहनों को रोक-रोक कर मोटर, गाड़ी वाले संपन्न लोगों को जबरदस्ती खीर बांटी जा रही है। गरीबों का नामोनिशान ! .. पता नहीं कहां था ?
मैं समझती थी कि भंडारे में गरीबों के निमित्त ही भोजन बनाया जाता है क्योंकि सच समझा जाए कि दिया भरपूर है मगर भंडारे में इससे पहले मैं कभी शरीक हुई ही नहीं थी। खीर अच्छे-अच्छों की आँख खोल देता है। मेरी भी खुल गई । जिस तरह उनपचास दिन तपस्या कालीन कठिन उपवास में बुद्ध के आरंभिक पाँच शिष्य भी उन्हें छोड़ कर चले गए और भीषण क्षुधा से बुद्ध के प्राण स्वंय संकट में पड़ गए । ऐसे में समीपवर्ती गाँव की एक स्त्री सुजाता की उन्हें वृक्ष देव समझकर अर्पित की गयी खीर से उनकी जीवन रक्षा हुई और तब जरा चैतन्य होने पर उन्हें पहला ज्ञान प्राप्त हुआ कि ‘अति हर चीज की बुरी होती है’ उसी तरह आज भंडारे में सावन की खीर के बंटवारे से मैं भी समझ गई कि यहां आँख मूंदकर अति दान देना बेवकूफी है। यहां भरे पेट वालों के पेट में और खाना ठूंस-ठूंसकर पुण्य कमाने का दिखावा हो रहा है और जिनके लिए सबने जी खोलकर दान किया वो दूर-दूर तक कहीं दिख ही नहीं रहे ।
सावन की खीर से मन खिन्न तो हुआ मगर जो दूध भंडारे में दान किया, उसका पुण्य मुझे मिला जरूर। तीन बरस पहले सावन के पहले सोमवार को ही मुझे एक घायल,नन्हा,मरियल सा कुत्ता मिला। तीनों वक्त दूध पिलाया कि जल्दी से उसकी टूटी टाँगे ठीक हो जांय। चेन से बाँधकर रखने की आवश्यकता नहीं पड़ी, क्योंकि ठीक हो जाने पर भी उसने स्वेच्छा से कभी हमारी दहलीज छोड़ने का मन नहीं बनाया ।
हां,गली से गुजरते लोगों पर झपटने को झटपट दौड़ पड़ता है, जब कपड़ों की गंध से ही वो इंसान की फितरत का सही-सही अंदाजा लगा लेता है। किसी काम से कहीं बाहर निकलने की मेरी सुगबुगाहट से ही चौकन्ना होकर अंगरक्षक की तरह ही मेरे साथ-साथ चलने लगता है। ऑफिस जाते मालिक को पूंछ हिला-हिलाकर कर विदा करता है। लौटने पर कूं-कूं करता उछल-उछल कर स्वागत करता है ।
बच्चों की बॉल ढूंढ़कर लाता है। बारिश की बूंद पड़ने से पहले ही काले बादल देखकर रस्सी से कपड़े उतारना शुरू कर देता है। अपने काम से मेरे चेहरे पर खुशी पहचानकर कभी-कभी खुद ही मुझसे लिपटने आ जाता है। नाटकीय अंदाज में आँखे मिचमिचाकर कई बार वो मेरी पलकें भी गीली कर जाता है।
सच में सावन वही जो तन के साथ-साथ अंतर्मन को भी भिगो जाये। संतुष्टि है कि शिवलिंग और नंदी प्रतिमा पर चाहे कभी दूध चढ़ाया न चढ़ाया , मगर दूध के दाम द्वार पर एक ‘भैरव’ देवता जरूर बाँध लिया ।
प्रतिभा की कलम से
