कुमार विश्वास को कालनेमि कहें या गिरगिट…
डॉ राजेश्वर उनियाल
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बंधुओ, कुमार विश्वास के नित बदलते रंगों को देखकर यही कहा जा सकता है कि यह कभी कालनेमि बन जाता है, तो कभी गिरगिट की तरह रंग बदलता रहता है। वर्तमान परिपेक्ष्य में इसके तीन रूप हैं। पहले रूप में यह एक कवि कहलाता है, दूसरे रूप में राजनीतिक और तीसरा रूप रामनामी शाल लपेट कर कालनेमि प्रवचनकारी।
इन महाशय का पहला परिचय एक कवि के रूप में कराया जाता है। इसमें उनकी वाकपटुता और श्रोताओं को मोहित करने की शैली उन्हें ऊंचाई अवश्य प्रदान करती है। लेकिन, चंद तुकबाजी और लफ्फाजी के अलावा उनकी ऐसी कौन सी कविता है, जो कि उन्हें हिंदी साहित्य के शीर्ष पर स्थान दे सके?
उनकी दूसरी महत्वाकांक्षा राजनीति की रही है। उसके लिए यह टिकट ब्लैकिया और कश्मीर में रेफरेंडम की मांग करने वाले देशद्रोहियों के साथ मंच पर बैठकर दांत निपोड़ते रहे। अब जिसे केजरीवाल तक ने भी हकाल दिया है, वह कितना विश्वसनीय व्यक्ति होगा।
अब इन्होंने तीसरा चोला प्रवचनकारी का ओढ़ा है। वाकपटुता के कारण वह श्रोताओं को सम्मोहित तो कर देते हैं। लेकिन, कई बार कथा सुनाते समय महाबेवकूफियां भी दिखा देते हैं। दरअसल, चालाकी और व्यावसायिक प्रवृत्ति के कारण वह आयोजक और श्रोताओं के अनुरूप श्री राम और श्री कृष्ण की कथाओं को भी तोड़मरोड़ कर अपने एजेंडे के अनुसार सुनाने में सिद्धहस्त हैं।
सच्चाई यह है कि यह व्यक्ति जीवन के हर क्षेत्र में असफल होने के कारण फ्रस्ट्रेशन का शिकार हो गया है। परंतु इस कालनेमि का असली चेहरा अब बाहर आ रहा है। लेकिन कोई आश्चर्य नहीं कि हो सकता है कि यह भी जिंदगी की ठोकरें खाते-खाते एक दिन जावेद अख्तर की तरह सुधरने लग जाए।
