इतिहास के झरोखे से.. गढ़वाल की महारानी की अनूठी कहानी, जिसने काट दिए थे मुगल सेनापति और सैनिकों के नाक-कान
-दिल्ली के तख्त पर शाहजहां के विराजमान रहने के दौरान मुगलों के किया था गढ़वाल राज्य पर आक्रमण। गढ़वाल की महारानी कर्णावती से मुगलों को मिली शर्मनाक मात। महारानी के कटवा दिए मुगल सेनापति व सैनिकों के नाक और कान। आइए जानते हैं वरिष्ठ पत्रकार वीरेन्द्र डंगवाल “पार्थ” के साथ महारानी कर्णावती के साहस और चातुर्य की दास्तान..

वीरेन्द्र डंगवाल “पार्थ”
देहरादून, उत्तराखंड
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हिंदुस्तान पर मुगलों की सत्ता के दौरान गैर मुस्लिमों पर मुगलों के अत्याचारों की कहानियां इतिहास में भरी पड़ी हैं। औरंगजेब ने गुरु गोविंद सिंह के साहिबजादों जोरावर सिंह और फतेह सिंह को जिंदा दीवार में चिनवा दिया था। ऐसी क्रूरता के लिए पहचान रखने वाले मुगलों के सेनापति और सैनिकों के नाक-कान गढ़वाल की महारानी ने कतार में खड़े कर कटवा दी थी… सहसा इस पर विश्वास नहीं होता। लेकिन, गढ़वाल की महारानी ने ऐसा पराक्रम किया था यह निकोलस मनूची की ‘हिस्ट्री ऑफ मुगल’ में दर्ज है। गढ़वाल की ऐसी पराक्रमी और साहसी महारानी थी कर्णावती।

मुगलों के साथ गढ़वाली सेना के युद्ध को दर्शाती एक पेंटिंग। यह पेंटिंग पुराना दरबार ट्रस्ट के पास संरक्षित है। राजपरिवार के सदस्य ठाकुर भवानी प्रताप सिंह के सौजन्य से पेंटिंग का यह चित्र शब्द रथ को प्राप्त हुआ है।
गढ़वाल की महारानी कर्णावती के साहस व चातुर्य की अनूठी कहानी हरिकृष्ण रतूड़ी की पुस्तक गढ़वाल का इतिहास से भले ही गायब हो। लेकिन, महारानी कर्णावती भारतवर्ष के इतिहास से गायब नहीं है। आइए जानते हैं महारानी कर्णावती के साहस और चातुर्य की कहानी। जिसने ताजमहल बनाने वाले शाहजहां की सेना को शर्मनाक मात दी थी। यह भारतवर्ष की शायद एकमात्र घटना है, जब मुगल सेनापति और सैनिकों के नाक कान एक महारानी के कटवा दिए, वह भी अपने राजदरबार में पंक्तिबद्ध खड़े कर।

पेंटिंग में महारानी कर्णावती
महारानी ने बतौर संरक्षिका संभाली गढ़वाल की सत्ता
महारानी कर्णावती गढ़वाल के पंवार (परमार) वंश के महाराजा महिपतशाह की पत्नी थी। महिपति शाह के स्वर्ग सिधार जाने के बाद सात वर्षीय राजकुमार पृथ्वीपति शाह को राजा घोषित किया गया। लेकिन, राजा के नाबालिग होने के कारण राजकाज उनकी मां (राजमाता) महारानी कर्णावती ने (बतौर संरक्षिका) अपने हाथ में ले लिया। इतिहास में पृथ्वीपति शाह का शासन सन 1646-1676 दर्ज है। उस वक्त गढ़वाल राज्य की राजधानी श्रीनगर थी और दिल्ली के तख्त पर शाहजहां विराजमान था।
मुगलों को खटक रहा था गढ़वाल का स्वतंत्र अस्तित्व
दिल्ली पर कब्जा जमाए मुगल शासकों को यह बात हजम नहीं हो रही थी कि गढ़वाल का राजा स्वतंत्र अस्तित्व बनाए हुए है। उनका विचार था कि गढ़वाल के राजा को अपने अधीन किया जाय। यदि उसे मुगल साम्राज्य का अंग न बनाया जा सके तो कम से कम अधीनता स्वीकार कराई जाय। ऐसे में जब रानी कर्णावती राज (बतौर संरक्षिका) कर रही थी। कांगड़ा के मुगल सूबेदार नजाबत खां ने गढ़वाल को जीतकर मुगल साम्राज्य में मिलाने के लिए आक्रमण करने की इजाजत शाहजहां से मांगी। शाहजहां ने 2000 घुड़सवार सैनिकों के साथ ही जो सहायता नजाबत खां ने मांगी, उसे दे दी। नजाबत खां ने सिरमौर के राजा मान्धाता प्रकाश को अपने साथ मिला लिया। (गढ़वाल के सेनापति रिखोला लोदी ने सिरमौर राज्य के काणी गढ़ (कालसी) और विराट गढ़ को गढ़वाल में मिला लिया था, इसलिए वह गढ़वाल से नाराज़ था। वह अपने दोनों गढ़ वापस चाहता था, इसलिए वह नजाबत खां का साथ देने के लिए तैयार हो गया)।
गढ़वाल विजय के लिए रवाना हुआ नजाबत खां
नजाबत खां 10 हजार पैदल सैनिक, 4 हजार घुड़सवार, हजारों सहयोगी और सिरमौर की सेना लेकर गढ़वाल पर आक्रमण के लिए रवाना हुआ। सेना में कुल 30,000 लोग थे। नजाबत खां और मान्धाता प्रकाश ने यमुना किनारे शेरगढ़ किले पर आक्रमण कर उसे जीत लिया। इसके बाद उन्होंने काणी गढ़ (कालसी) पर भी अधिकार कर लिया। मान्धाता प्रकाश की प्रार्थना पर मुगल सैनिकों ने विराटगढ़ पर आक्रमण किया और जीत लिया। जीते हुए दोनों गढ़ मान्धाता प्रकाश को दे दिए गए। पूरब की तरफ बढ़ते हुए नबाजत खां ने संतूरगढ़ भी जीत लिया। अपना अधिकार बनाए रखने के लिए उसने जीता हुआ किला लाखनपुर ने स्थानीय जमींदार जगतू के हवाले कर दिया। साथ ही एक हजार पैदल सैनिक व 100 घुड़सवार वहां की सुरक्षा के लिए तैनात कर दिए। नजाबत खां वर्तमान डोईवाला, माजरी, थानों होते हुए ऋषिकेश पहुंचा। यहां वीरभद्र में बने किले पर उसने अधिकार कर लिया। पूरे रास्ते हुए कहीं भी गढ़वाली सैनिकों से युद्ध नहीं करना पड़ा। यहां से हरिद्वार पहुंचकर वह गढ़वाल भाबर के पहाड़ी क्षेत्र में घुसा।

गढ़वाल विजय के प्रति आश्वस्त था मदमस्त नजाबत खां
कई गढ़ और किले जीतकर मदमस्त नजाबत खां गढ़वाल विजय के प्रति आश्वस्त हो चुका था। लेकिन, उसे नहीं पता था कि जिस पहाड़ी क्षेत्र में वह कदम रख रहा है, वहां उसे न सिर्फ हर मिलने वाली है, बल्कि जीवन का सबसे शर्मनाक पल उसका इंतजार कर रहा है। इसकी शुरूआत हो चुकी थी, गढ़वाल भाबर से पहाड़ में घुसते ही उस गढ़वाली सैनिकों का विरोध झेलना पड़ गया। उस क्षेत्र में गढ़वाली सेनापति ने महत्वपूर्ण क्षेत्रों में सैनिक तैनात किए हुए थे, जो आक्रमणकारी को रोक सकें। विरोध के बावजूद नजाबत खां श्रीनगर से 60 मील की दूरी (मवालस्यू बिनसर क्षेत्र) तक पहुंच गया।
महारानी के साहस व चातुर्य की कहानी शुरू
नजाबत खां के मवालस्यू तक पहुंचने की खबर महारानी कर्णावती तक पहुंची तो उन्होंने मुगलों को हराने के कूटनीतिक प्रयास शुरू कर दिए। मुगलों से घबराए बिना महारानी साहस का परिचय देते हुए चतुरता से उन्हें मात देते की रूपरेखा तैयार की। उसे अमली जामा पहनाने के लिए नजाबत खां को प्रस्ताव भिजवाया गया। महारानी ने प्रस्ताव में कहा कि वह शाहजहां की अधीनता स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। यदि मुगल सेना हटा ली जाय और उन्हें 15 दिन का समय दिया जाय तो वह 10 लाख रुपए बतौर नजराना भी देंगी। प्रस्ताव सुनकर नजाबत खां अपनी जीत और रानी की हर पर खुश हुआ। उसने महारानी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। शायद सोचता होगा कि पहाड़ी रानी डर गई। वह वहीं, पड़ाव डालकर वह 10 लाख रुपए का रुपए का इंतजार करने लगा। 15 दिन बीत गए लेकिन, महारानी ने 10 लाख रुपए क्या एक पैसा नहीं भिजवाया। महारानी तरह-तरह के बहाने बनाकर समय टालती रही। डेढ़ महीना बीत गया तो महारानी ने मात्र एक लाख रुपए भिजवा दिए। दूसरी तरफ, ज्यादा समय हो जाने के कारण मुगल सेना की रसद लगभग खत्म हो गई, इसी का महारानी को इंतजार था। इस बीच मुगल सेना में मलेरिया भी फैल गया। बीमारी से कई सैनिक मर गए। ऐसे में गढ़वाल की सेना ने मुगलों पर धावा बोलकर सेनापति नजाबत खां सहित सैनिक को अधिकार में लिया।

मुगल सेना को बन्दी बनाती गढ़वाली सेना
काटे गए सेनापति नजाबत खां और सैनिकों के नाक-कान
गढ़वाली सेना मुगल सेनापति नजाबत खां सहित सैनिकों को गढ़वाल की राजधानी श्रीनगर ले गई। श्रीनगर राज दरबार ने उन्हें महारानी कर्णावती के सामने पेश किया गया। उन्हें गढ़वाल पर बेवजह आक्रमण करने का दोषी ठहराते हुए सजा दी गई। सजा के तौर पर सिरकलम या नाक-कान कटवाना तय किया गया। नजाबत खां सहित मुगल सैनिकों ने जान गंवाने के बजाय नाक-कान कटवाना उचित समझा। इस तरह महारानी कर्णावती के श्रीनगर राज दरबार में एक-एक मुगल सेनापति और सैनिकों के नाक-कान कट दिए गए।
कांगड़ा वापस नहीं गया नजाबत खां
महारानी कर्णावती से शर्मनाक हार व नाक-कान कटवाने के बाद नजाबत खां सैनिकों के साथ कोटद्वार, नजीबाबाद होते हुए मुगल क्षेत्र में आ गया। शर्म के मारे वह उस कांगड़ा वापस नहीं गया, जहां का वह गवर्नर था। कहा जाता है नजाबत खां श्रीनगर राज दरबार में हुई शर्मनाक घटना से इतना आहत था कि उसने नजीबाबाद के आसपास आत्महत्या कर ली। वहीं, नजाबत खां के जाने के बाद महारानी कर्णावती ने देहरादून को फिर अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया। हालांकि, काणी गढ़ (कालसी) और विराट गढ़ सिरमौर राज्य में ही रहने दिए।

पेंटिंग के नीचे लिखा हुआ है कि नजाबत खां की 35 हजार की सेना को गढ़वाली सेना ने परास्त किया और उनके नाक कान काट लिए गए।
नाककाटी रानी के रूप में हुई प्रसिद्ध
महारानी कर्णावती के मुगलों को पराजित कर सेनापति नजाबत खान व सैनिकों के नाक-कान कटवाने के बाद उन्हें नाककाटी रानी के रूप में जाना गया। इसके घटना के बाद उन्हें नाककाटी रानी ही कहा जाता था। मुगल सेना की इस शर्मनाक हार से शाहजहां भी बहुत आहत हुआ। पृथ्वी पति शाह के बालिग होने पर महारानी ने सभी अधिकार उन्हें सौंप दिए।
महारानी ने देहरादून में किए विकास के काम, बनाई नहर
महारानी कर्णावती ने देहरादून वापस पाने के यहां कई विकास के काम करवाए। उन्होंने एक नहर बनवाई, जो राजपुर से शुरू होकर गुरु राम राय के झंडे के सामने बने तालाब में खत्म होती थी। इस बीच पड़ने वाले पूरे क्षेत्र की पेयजल आपूर्ति व सिंचाई इसी नहर से होती थी। बाद में इस नहर के पानी को वर्तमान में दिलाराम चौक पा बने वाटर बॉक्स से जोड़ दिया गया।
नवादा में बनाया महल और तालाब
उन दिनों देहरादून का प्रशासनिक कार्यालय नवादा में होता था। महारानी ने नवादा में एक महल और तालाब बनवाया। गढ़वाल पर गोर्खाओं के आक्रमण के बाद नवादा वीरान हो गया। 16वीं सदी ने बने उस महल के अवशेष 20वीं सदी तक रहे।
महारानी के नाम कर्णपुर और पृथ्वी पति शाह के नाम पर बसाया पृथ्वीपुर
देहरादून में नहर व नवादा में महल, तालाब आदि बनाने के साथ ही महारानी कर्णावती ने कर्णपुर (आज का करनपुर मोहल्ला) गांव बसाया गया। जबकि, पृथ्वीपति शाह के नाम पर पृथ्वीपुर गांव बसाया गया। दोनों ही आज भी अस्तित्व में हैं।-
सर्वाधिकार सुरक्षित।
प्रकाशित…..27/02/2021
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