अबोध हूँ , अनभिज्ञ हूँ .. संसार के रीति-रिवाजों से जकड़ा हूँ..
अमित नैथाणी ‘मिट्ठू’
ऋषिकेश, उत्तराखण्ड
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मैं आनन्दित हो गया हूँ
अबोध हूँ , अनभिज्ञ हूँ ..
संसार के रीति-रिवाजों से जकड़ा हूँ..
घुमक्कड़ी जिज्ञासा और बटोही बनकर,
लक्ष्य की तरफ बढ़ रहा हूँ।
प्रकृति की गोद में आकर
आज मैं आनन्दित हो गया हूँ
श्याम कलेवर मेघ मेरे,
साथी बनकर चल रहे हैं।
इस एकान्त अरण्य में मेरा,
पक्षी स्वागत कर रहे हैं।
शीतल जल से प्यास बुझाकर,
आगे बढ़ता जा रहा हूँ।
प्रकृति की गोद में आकर
आज मैं आनन्दित हो गया हूँ
श्वेत पुष्पों से अलंकृत धरा में,
मंद-मंद बहती शीतल हवा में।
अदभुत छटा बिखेरे नभ में,
सूर्यनारायण को निहार रहा हूँ।
प्रकृति की गोद में आकर
आज मैं आनन्दित हो गया हूँ

धैर्य न मेरा टूटने दिया,
थकान का देह को आभास न हुआ।
घने वृक्षों का आँचल पाकर,
हर्ष से हृदय गदगद हुआ।
परमात्मा की इस लीला का कैसे,
अपने शब्दों में बखान करूँ?
प्रकृति की गोद में आकर
आज मैं आनन्दित हो गया हूँ
तू समक्ष न था, फिर भी तेरा अनुभव हुआ,
तुझसे मिलने, तुझे जानने के लिए मन प्रफुल्लित था।
बहुत कुछ कहना चाहता था, परन्तु कण्ठ मेरा अवरुद्ध था,
बन्द नयनों से तेरे स्वरुप का, अश्रुओं से अभिषेक हो रहा था।
हे परमपिता परमेश्वर..!
फड़फडाते होंठों से मैं कैसे तेरी स्तुति करूँ?
तेरी इस सुंदर कृति को देखकर
आज मैं आनन्दित हो गया हूँ
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सर्वाधिकार सुरक्षित।
प्रकाशित…..18/11/2020
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