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वरिष्ठ कवि/शाइर जीके पिपिल की एक ग़ज़ल … हर चीज़ है सुहानी फिर भी कुछ कमी सी है

जीके पिपिल
देहरादून, उत्तराखंड


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गज़ल

हर चीज़ है सुहानी फिर भी कुछ कमी सी है
आंखों में नहीं पानी फिर भी कुछ नमी सी है

आसां नहीं है इंसान के हालात को समझना
चहरों पर हँसी है तो दिल में कुछ गमी सी है

मंहगाई के इस दौर में जब आस्थाएं गुम गईं
रिश्तों में तपिश ना रही बर्फ़ कुछ जमी सी है

माना उसने आज उड़कर आसमान छू लिया
मगर अब भी उसके पांव में कुछ जमीं सी है

आसमां खुशियों का महरूम सा है परिंदों से
चल भी रही है ज़िंदगी मगर कुछ थमी सी है।।

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