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वरिष्ठ कवि जीके पिपिल की एक ग़ज़ल… कोई उनसे कहो कि आज दीवाली है लौट आये… 

जीके पिपिल
देहरादून, उत्तराखंड

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गज़ल 

कोई पास ना आने के कर गया बहाने कैसे कैसे
छूटे हैं हाथ आते आते हम से खज़ाने कैसे कैसे।

अब तो ना यार मिला और ना ही विसाले सनम
उसे पाने की ज़िद में छूटे दोस्त पुराने कैसे कैसे।

कभी आँखों मे बसता है कभी दिलों में बसता है
बड़े मुक्तसर हैं रहने के उसके ठिकाने कैसे कैसे।

जब कभी वो रूंठा था किसी की किसी बात पर
उसे मनाने आये थे हम तो क्या घराने कैसे कैसे।

वो जब साथ साथ थे तब पतझर का मौसम था
फ़िर भी राह में आये थे मन्जर सुहाने कैसे कैसे।

उनसे एक मुलाक़ात क्या हुई किसी रहगुज़र पर
लोगों ने बना दिये कहानी और फ़साने कैसे कैसे।

इश्क़ में ज़िद जुनून व बग़ावत नहीं तो बेकार है
इश्क़ मापने को दुनियाँ में हैं ये पैमाने कैसे कैसे।

हम भी उनके इशारे पर अपनी जान दे सकते हैं
उन्हें पता नहीं जग में हैं उनके दीवाने कैसे कैसे।

कोई उनसे कहो कि आज दीवाली है लौट आये
आज तक हम पर भी गुजरे हैं जमाने कैसे कैसे।।

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