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कवि सुभाष चंद वर्मा की एक रचना… प्रकृति का आंचल मेरा गांव है

सुभाष चंद वर्मा
देहरादून,उत्तराखंड


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मेरा गांव

नदी का किनारा पेड़ की छांव है,
खेत में कर्मयोगी नंगे पांव है।
यहां श्रमिक ग्रामीण किसान है,
प्रकृति का आंचल मेरा गांव है।

बाग में गूंजती हैं कोयल की धुनें,
मधुर संगीत की स्वर लहरी बनें।
अपना है दारिया अपनी नांव है,
प्रकृति का आंचल मेरा गांव है।

पेड़ पर घोंसले चिड़ियों की चहक,
खेत में उड़ रही फसलों की महक।
परिश्रम यहां सबका स्वभाव है,
प्रकृति का आंचल मेरा गांव है।

सच्चाई मेहनत ही संकल्प है,
सादगी का न कोई विकल्प है।
जितनी है चादर उतने पांव हैं,
प्रीकृति का आंचल मेरा गांव है।

हम होंगे सफल ये विश्वास है,
मेरे गांव की खुशबू में सुभाष है।
यहां उड़ते हैं बादल धूप छांव है,
प्रीकृति का आंचल मेरा गांव है।

नदी का किनारा पेड़ की छांव है,
खेत में कर्मयोगी नंगे पांव है।
यहां श्रमिक ग्रामीण किसान है,
प्रकृति का आंचल मेरा गांव है।

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