Wed. Jun 3rd, 2026

कवि वीरेन्द्र डंगवाल “पार्थ” के प्रेम पर कुछ मुक्तक

वीरेन्द्र डंगवाल “पार्थ”
देहरादून, उत्तराखंड


——————————————————————-

मुक्तक

 

1-

मधुप जब पास आए तो कुसुम बोले शरारत है
नहीं वो जान पाएं ये जवां दिल की इबादत है
हमारी चाहतों को तुम न देना नाम कोई भी
तुम्हें मालूम तो होगा हमें तुमसे मुहब्बत है।।

 

2-

दिखेंगी झील सी आंखें यकीं फरमान होंगे ही
तुम्हारा साथ होगा जब जवां अरमान होंगे ही
मधुप कब तक सहेजेगा कि अरमानों कि डोली को
कुसुम बिखरा दिये मकरंद तो रसपान होंगे ही।।

 

3-

कहूं मन की कहानी या कि मैं चुपचाप हो जाऊं
नमी बन के रहूं तुझमें कि यारा भाप हो जाऊं
नहीं जीना तुम्हारे बिन मुझे चंदा कि इकपल भी
बनूं चंदन कि माथे का कि मैं अभिशाप हो जाऊं।।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *