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तारा पाठक की कुमाउनी कविता…. महादेव पार्वती ब्या

तारा पाठक
हल्द्वानी, उत्तराखंड
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कुमाउनी कविता- महादेव पार्वती ब्या
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अहा! कस सौण झुलि रौ
हमार पहाड़न।
गदू -काकाड़ लड़बड़ै रीं
क्यारि बाड़न।

झर झुङर इतरै रौ
धाना बाल शरमै रीं।
मडू कूं मैं जै ठुल
बालाड़ माथि माथी छितरी रीं।

कमर में भौ जास थामी
काकुनी बोट ठाड़ है रीं।
स्यौ -खुमानी दावत हुं
बरेती जास चाड़ भै रीं।

मोत्यूं जास दाँत देखूणी
खित्त कनै अनार-दाड़िम।
आइ देखूणी, आइ लुकूणी
मूंगा जास ग्याड़, घिङारू झेड़िन।

आर बेड़ू डाव लादी रीं
बण मिहव कैं को समावौ।
धत्यै धत्यै अखोड़ पटै गीं
हमन खावौ, हमन खावौ।

एथकै उथकै हौ पछ्याटनैंल
डाव बरेती जास नाचणी।
फूलों में बहार ऐरै
सुहागिन जास छाजणी।

डान कानन हौल झुरी रौ
जाणि जै कौला टैंट छ।
गाड़ -गध्यार भमभमै रीं
कस भल बैंड छ।

देवभूमि उत्तराखंड
साक्षात स्वर्ग यां छ।
हर्यावै डाई मंडप में
महादेव -पार्वती ब्या छ।

आम-बुब, इज-बाबू
दाद-भौजी, नान -ठुल, काक काखी।
हमन न्यूंत न्है नि कया
सब्बै जणी बलै राखी।

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