मुंबई महाराष्ट्र से तारा पाठक की एक कविता… उचित है मैं केंचुआ हूँ.. कोशिश भी नहीं की बनूं संपोला
तारा पाठक
वर्सोवा मुंबई, महाराष्ट्र
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दूसरों के लिए
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उचित है मैं केंचुआ हूँ।
चाह भी यही है कि केंचुआ रहूँ।
कोशिश भी नहीं है कि बनूं सपोला।
बनना नहीं चाहता विषधर कोई जहरीला।
फर्क क्या पड़ जाएगा यदि नाग बन जाऊं बड़ा मैं।
नेपथ्य में उससे भी विशाल अजगर पड़ा है।
बना रहा यदि केंचुआ तो जहर नहीं उगलुंगा।
न घातक कहलाउंगा, न बेकसूर निगलुंगा।
उसी मृदा से अस्तित्व पाकर मिल जाउंगा उसी में।
खोज लूंगा अमन यूं ही औरों की खुशी में।
