इतिहास के झरोखे से वीरेन्द्र डंगवाल “पार्थ” की रिपोर्ट… महाराजा के पास रुपए होते तो नहीं बनता ब्रिटिश गढ़वाल
वीरेन्द्र डंगवाल “पार्थ”
देहरादून, उत्तराखंड
——————————————-
-गढ़वाल पर गोरखाओं का आक्रमण, अंग्रेजों की सहायता से गोरखाओं को गढ़वाल से खदेड़ना, उसके बाद गढ़वाल के दो हिस्से हो जाना, टिहरी रियासत, टिहरी शहर का अस्तित्व में आना और फिर बांध के लिए टिहरी शहर का उजड़ जाना… यह सब एक लंबे कालखंड में घटित हुआ। इस कालखंड पर वरिष्ठ पत्रकार वीरेन्द्र डंगवाल “पार्थ” की ऐतिहासिक तथ्यों के साथ एक रिपोर्ट।


धुनारों की बस्ती से लेकर राजनगर तक का सफर, राजनगर का वैभव और फिर बांध की खातिर जल समाधि लेने वाला टिहरी शहर भूगोल से इतिहास में बदल चुका है। जल समाधि लेने के बाद यह राजनगर नक्शे से हमेशा के लिए मिट गया। लेकिन, वहां के वाशिंदों की यादों में वह हमेशा जिन्दा रहेगा। साथ ही जिंदा रहेंगे पट्टी अठूर सहित अन्य गांव जो बांध की खातिर विशालकाय झील में समा गए। 28 दिसम्बर को टिहरी के जन्मदिवस यानी टिहरी राज्य स्थापना दिवस पर टिहरी को याद करते हुए उस इतिहास पर कुछ जानकारी, जब एक धुनारों की बस्ती बनती है राजनगर।

इस बस्ती का उल्लेख स्कन्द पुराण में मिलता है, जहां पर एक ऐसे स्वंभू शिवलिंग का वर्णन है। जिस पर घोर कलयुग में भी लोगों की अपार श्रद्धा रहेगी। वहीं, स्कन्द पुराण में इस बस्ती के पास अष्टवक्र क्षेत्र (पट्टी अठूर) का भी वर्णन मिलता है। जो टिहरी शहर के साथ ही बांध के लिए बनी झील में समा गया है। पट्टी आठूर के लोग टिहरी बांध के कारण सबसे पहले विस्थापित हुए थे।
हम बात कर रहे हैं उस शहर की जो वर्ष 1815 से पहले सिर्फ धुनारों की बस्ती भर था। गढ़वाल राज्य पर गोरखाओं के आक्रमण को टिहरी का सौभाग्य कहें या कि गढ़वाल का दुर्भाग्य, क्योंकि गढ़वाल पर गोरखाओं के आक्रमण के कारण ही पृथक टिहरी गढ़वाल राज्य अस्तित्व में आया। गोरखाओं के आक्रमण करने पर ही तत्कालीन गढ़वाल नरेश प्रद्युम्न शाह लड़ते-हटते श्रीनगर (गढ़वाल) से देहरादून जा पहुंचे और खुड़बुडा के मैदान में (वर्ष 1803) वीरगति को प्राप्त हुए। इसके बाद संपूर्ण गढ़वाल पर गोरखाओं का साम्राज्य स्थापित हो गया। गढ़वाल पर गोरखाओं का राज हो जाने पर राजकुमार सुदर्शन शाह को निर्वासित जीवन व्यतीत करना पड़ा। युद्ध के समय ही राजकुमार सुदर्शन शाह को पहले ही हरिद्वार पहुंचा दिया गया था। एक दशक बाद सुदर्शन शाह ने अपनी शक्ति कुछ मजबूत की और अंग्रजों से सहायता मांगी। उसके बाद अंग्रजों की मदद से गढ़वाल राज्य को गोरखा से मुक्त किया गया।

5 लाख रुपए न होने पर दिया आधा गढ़वाल
अंग्रेजों ने राजकुमार सुदर्शन शाह से सहायता करने के लिए इस शर्त पर करार किया था कि अंग्रेजी सेना का खर्च सुदर्शन शाह उठाएंगे यानी उन्हें सहायता के लिए मेहनताना देना होगा। गढ़वाल को गोरखाओं से स्वतंत्र करने के बाद अंग्रेजों ने सुदर्शन शाह से मेहनताना मांगा, जो कि उस वक्त 5 लाख रुपया आंका गया। अंग्रेजों का मेहनताना मांगना स्वाभाविक ही था। लेकिन, गढ़वाल नरेश की स्थिति उस वक्त ऐसी नहीं थी कि वह रुपयों में उनकी मदद का मेहनताना दे सकते। वह खुद 12 वर्षों से निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे थे। ऐसे में गढ़वाल राज्य के दो हिस्से किए गए। आधा हिस्सा अंग्रेजों के पास चला गया जो ब्रिटिश गढ़वाल कहलाया और आधा हिस्सा राजा सुदर्शन शाह के पास रहा जो बाद में टिहरी गढ़वाल कहलाया। यहां गौरतलब है कि यदि राजा के पास उस समय 5 लाख रुपया होता तो आधा गढ़वाल अंग्रेजों के पास नहीं जाता और ब्रिटिश गढ़वाल नहीं बनता। वर्तमान पौड़ी-चमोली (ब्रिटिश गढ़वाल) का हिस्सा भी राजा ने अंग्रेजों को इसलिए दिया (वहां से आक्रमण होते थे)। खुद गढ़वाल का पश्चिमी हिस्सा (वर्तमान टिहरी-उत्तरकाशी) रखा ताकि बाहरी आक्रमणकारियों के हमले से बचा जा सके।
नई राजधानी की खोज, टिहरी का अस्तित्व में आना
गढ़वाल के इस बंटवारे के बाद शुरू होती है नई राजधानी की खोज और टिहरी का अस्तित्व में आना। जब संपूर्ण गढ़वाल एक था तब गढ़वाल राज्य की राजधानी श्रीनगर थी। श्रीनगर राजधानी राजा अजयपाल ने 1517 में बनाई थी। श्रीनगर में 386 वर्ष तक राजधानी रही। उससे पहले राजधानी देवल गढ़ थी, वहां राजधानी राजा अजयपाल ने ही 1512 में बनाई थी। देवलगढ़ में मात्र 5 वर्ष ही राजधानी रही। देवलगढ़ से पहले राजधानी चांदपुर गढ़ थी। यहां विशेष उल्लेखनीय है कि संपूर्ण गढ़वाल को एक करने का श्रेय राजा अजय पाल को ही है। वह संपूर्ण गढ़वाल के पहले नरेश थे। बंटवारे में श्रीनगर अंग्रेजों के पास चला गया। तब सबसे बड़ी जरूरत यह हुई कि गढ़वाल नरेश अपनी राजधानी कहां बनाएं। पंडितों से सलाह मशविरा हुआ तो पंडितों ने राय दी कि पूर्व राजधानी श्रीनगर अलकनंदा नदी के बाएं भाग पर बसी थी और अब राजधानी ले लिए भागीरथी नदी के दाहिने भाग पर स्थित अष्टवक्र क्षेत्र (अष्टवक्र क्षेत्र बाद में पट्टी अठूर के नाम से जाना गया, स्कन्द पुराण में अठूर को अष्टवक्र क्षेत्र कहा गया है) सबसे उपयुक्त है।
नई राजधानी की खोज को रवाना हुआ राजा का लश्कर
पंडितों की राय के बाद राजा का लश्कर श्रीनगर से नई राजधानी के उस स्थान को देखने के लिए रवाना हुआ, जो भागीरथी के दाहिने भाग पर बसा पट्टी अठूर का समतल क्षेत्र था। दूसरे दिन राजा का लश्कर भागीरथी व भिलंगना नदियों के संगम के ऊपर उस टीले पर बसी धुनारों की बस्ती में पहुंचा। वहां से पट्टी अठूर का दृश्य बड़ा ही मनोरम दिख रहा था। अठूर में लगभग 7-8 किमी लंबी और दो किमी चौड़ी (कहीं-कहीं एक डेढ़ किमी) पट्टी है, जो किसी नगर व राजधानी बनाने के लिए बहुत ही उपयुक्त स्थान है। कहते हैं धुनारों की बस्ती जहां से राजा अठूर का मनोरम दृश्य देख रहा था, वहां पर राजा का घोड़ा अचानक बैठ गया। लश्कर भी थका हुआ था, ऐसे में सफर की थकान मिटाने के लिए राजा ने अपने आदमियों को कुछ देर विश्राम करने को कहा। जिस टीले पर राजा विश्राम कर रहे थे, उस टीले के निचले हिस्से में सत्येश्वर महादेव का स्वयंभू लिंग था। राजा शिवलिंग की पूजा करने के बाद लेट गए और उनकी आंख लग गई। आंख खुली तो काफी देर हो चुकी थी। राजा ने लश्कर को तत्काल अठूर चलने का हुक्म दिया। राजा के घोड़े को लाख उठाने की कोशिश की गई लेकिन, घोड़ा नहीं उठा।

काल भैरव ने रोक दी राजा की सवारी
किवदंती है कि काल भैरव ने राजा के घोड़े को रोक लिया था। अंधेरा घिरने लगा तो राजा ने हुक्म दिया कि आज रात्रि विश्राम यहीं किया जाएगा। क्योंकि आगे नदी थी, जिसे पारकर अठूर जाना था। अंधेरे में नदी पार करना उचित नहीं नहीं समझा गया। रात में स्वप्न में राजा को किसी ने कहा कि वत्स यह स्थान तुम्हारी राजधानी के लिए सबसे उपयुक्त है। तुम यहीं पर अपनी राजधानी बनाओ। सुबह राजा ने यह बात सबको बताई। फिर उस स्थान की छानबीन की गई तो 10-12 धुनारों के घर के अलावा पूरी बस्ती निर्जन व उजाड़ थी। सुरक्षा की दृष्टि से भी यह स्थान सुरक्षित समझा गया। इसे तीन तरफ से नदियों ने घेर रखा था। सबकी सहमति हुई कि इस स्थान पर ही राजधानी बनाई जाय और उस तरह धुनारों की वह बस्ती राजधानी में तब्दील हो गई। कहां तो श्रीनगर से अठूर को राजधानी बनाने के लिए चले थे। लेकिन, राजनगर होने का सौभाग्य मिला धुनारों की बस्ती को। कहते हैं समय बड़ा बलवान होता है। समय के गर्भ में और ही कुछ था। यदि पट्टी अठूर राजधानी बन जानी तो शायद टिहरी गढ़वाल के बजाय अठूर गढ़वाल के नाम से राज्य स्थापित होता और आज जो टिहरी गढ़वाल जिला है तो शायद वह अठूर गढ़वाल होता।
28 दिसम्बर 1815 में स्थापित हुआ टिहरी
राजधानी के लिए स्थान का चयन होने के बाद महाराजा सुदर्शन शाह ने 28 दिसंबर 1815 को विधिवत रूप से यहां पर टिहरी गढ़वाल राज्य की राजधानी स्थापित कर दी। राजकोष पूरी तरह खाली था। सुदर्शन शाह ने खुद 12 वर्ष निर्वासित जीवन व्यतीत किया। आर्थिक तंगी और अल्प पूंजी से राजा ने राजधानी का निर्माण शुरू करवाया। मात्र 700 रुपए में 30 छोटे बड़े मकान बनवाए, इनमें खुद राजा का महल भी था, जिसमें दो कमरे नीचे, दो कमरे ऊपर व बरामदा था। यह सत्तेश्वर महादेव मंदिर से आगे घंटाघर की तरफ था। चार कमरों का यह मकान टिहरी नरेश का पहला राजमहल था। हालांकि चार कमरों के छोटे से मकान को महल नहीं कहा जा सकता। लेकिन, एक राज्य के राजा ने उसे अपने लिए बनवाया था और उसने लंबे समय तक वह रहा भी, तो उसे राजमहल नहीं तो राजभवन तो कहना ही चाहिए। लेकिन, इस छोटे राजभवन के बारे में कभी कहीं नहीं लिखा गया। पुराना दरबार और कैसल दरबार का ही उल्लेख किया जाता रहा।

30 साल में बना राजमहल
आर्थिक स्थिति से सुधारने पर बाद में राजा ने नगर के दक्षिण पश्चिम भाग में एक समतल ऊंचे टीले पर राजमहल का निर्माण करवाया। इस महल को बनने में 30 साल का समय लगा। (जिसे बाद में पुराना दरबार कहा गया। उसके भी बाद पुराना दरबार नाम एक पूरे मोहल्ले ने के लिया। पुराने महल को लोग ठाकुर बाड़ा कहने लगे)। बाद के वर्षों में महाराजा कीर्ति शाह ने दक्षिण में गंगा जी के ऊपर बाईं ओर एक ऊंचे टीले पर जिसका नाम कैसल था, वहां पर नया महल बनवाया। उसे कैसल दरबार कहा जाता था। विस्थापन की प्रक्रिया शुरू होने के बाद कैसल दरबार में कई सरकारी विभागों के कार्यालय रहे। इस तरह टिहरी में तीन राजभवन/महल बने थे। सबसे पहले बना छोटा का मकान/राजभवन बाद के दिनों में राजा ने डियुंडी लोगों को दे दिया था। फिर डयुंडियों से उसे थपलियाल लोगों ने खरीद लिया था। उस भवन के राजभवन होने की जानकारी बहुत कम लोगों को थी।

टिहरी रियासत पर छह राजाओं ने किया राज
टिहरी गढ़वाल राज्य पर छह राजाओं ने राज किया। इनमें से टिहरी गढ़वाल राज्य के संस्थापक सुदर्शन शाह ने ही सबसे लंबे समय तक राज किया। बाकी तीन राजा अल्पायु ही रहे। टिहरी के अंतिम महाराजा मानवेन्द्र शाह (बाद में टिहरी के सांसद) को 1946 में महाराजा नरेंद्र शाह ने स्वेच्छा से गद्दी सौंपी। 1948 में राजशाही का तख्ता पलट हो गया। उसके बाद टिहरी रियासत का भारतवर्ष में विलय हो गया। महाराजा मानवेन्द्र शाह नाममात्र के ही राजा हुए। छह राजाओं में सबसे कम राज उन्होंने ने ही किया। जबकि, उम्र के हिसाब से उनकी उम्र सबसे अधिक रही।
—————————————————————————–
टिहरी गढ़वाल के शासक-शासनकाल-शासन
महाराजा सुदर्शन शाह-1815 से 1859-45 वर्ष
महाराजा भवानी शाह-1859 से 1871-12 वर्ष
महाराजा प्रताप शाह-1871 से 1886-15 वर्ष
महाराजा कीर्ति शाह-1886 से 1913-27 वर्ष
महाराजा नरेंद्र शाह-1913 से 1946- 33 वर्ष
महाराजा मानवेन्द्र शाह-1946 से 1948-2 वर्ष
——————————————————————————-

निर्जन बस्ती बाद में बनी समृद्ध नगर
आर्थिक तंगी में टिहरी गढ़वाल राज्य की नीव पड़ी। लेकिन, धीरे धीरे राजकोष में रुपए आए तो समय समय पर राजाओं ने टिहरी में नई इमारतें बनाने के साथ ही कई विकास कार्य करवाए। टिहरी शहर टिहरी नरेश की राजधानी थी। नगर के उत्तर में भागीरथी (गंगा) भिलगना नदियों का संगम था, जिसका नाम गणेश प्रयाग था। प्राचीन काल का गणेश मंदिर भी वहां पर था, जो गंगा जी बाढ़ में बह गया। गणेश शिला के बाएं भाग में धनुष तीर्थ और दाहिने भाग में शेष तीर्थ था, जिसका वर्णन केदार खंड के अध्याय 147 में मिलता है। संगम के पास बाएं भाग पर राजघाट था। नगर के पूर्व में सात्येश्वर महादेव और भगवती दुर्गा का मंदिर था। नगर के पश्चिम में बदरीनाथ, केदारनाथ, दक्षिण में काली, शीतला माता, लक्ष्मी नारायण, नरबदेश्वर महादेव व रघुनाथ जी के मंदिर थे।

महारानी जियाजी गुलेरिया ने कराए कई विकास कार्य
बदरीनाथ, केदारनाथ जी के बड़े मंदिर, उनके साथ अच्छी इमारतें, धर्मशाला, पक्का घाट, मन्दिर से गंगा जी तक की पक्की सीढ़ियां गंगा जी का मंदिर, ये सब महारानी जियाजी गुलेरिया ने बनवाए। इनमें यात्रा के समय साधुओं को कच्चा व पका हुआ भोजन मिलता था। इसके अतिरिक्त पूजा, भीग, नौकरों के वेतन, ये सब खर्च महारानी जियाजी के भंडार से होता था। नगर में गुरुनानक जी का मंदिर/गुरुद्वारा था। उसका खर्च भी दरबार से चलता था। नदी के पार संगम के आगे दाहिनी ओर डाक बंगला था। पूरब की ओर भिलंगना नदी के पर दायरा नामक बाग में जंगलात का हेड ऑफिस था। दायरा बाग के नीचे कंडल गांव था। नगर से डेढ़ मील की दूरी पर भिलंगना नदी से तीन ओर से घिरा रानीबाग था, जिसे सिमलासू भी कहते थे। वहां पर मेहमानों के लिए गेस्ट हाउस और दरबार की तरफ से महल भी बने हुए थे।

महारानी विक्टोरिया की याद में बना टिहरी का घंटाघर
नगर से कुछ ऊंचा व कैसल दरबार से नीचे चणाखेत था। वहां पर राजा के जमाने की कचहरी, दफ्तर, हॉस्पिटल, हीवेट संस्कृत पाठशाला, सैंपर्स कम्पनी की बैरकें, पोलोफिल्ड, परेड खेत, बोर्डिंग हाउस व कुछ दुकानें थीं।चणाखेत में ही महाराजा कीर्ति शाह ने महारानी विक्टोरिया की डायमंड जुबली की याद में वर्ष 1897 में घंटाघर बनवाया। बाद में चणाखेत को घंटाघर मोहल्ले के रूप में जाना गया। कुछ पुराने लोग चणाखेत ही कहते थे। लेकिन, नई पीढ़ी घंटाघर ही कहती थी। 1973 में घंटाघर के सामने गढ़वाल विश्वविद्यालय का स्वामी राम तीर्थ परिसर (डिग्री कॉलेज) बनाया गया। जिसे बांध के कारण बाद ने बादशाही थौल शिफ्ट किया गया। राजा के ही जमाने में बाजार में पुलिस स्टेशन, पोस्ट ऑफिस, तार घर, लेडी हॉस्पिटल व हथियार बंद पुलिस की बैरकें थीं।
राजमहल के अलावा भी थे सुंदर भवन
राजमहल के अतिरिक्त कुछ अच्छी इमारतें टिहरी शहर में बनी थी। जिसमें जोशी कोठा, डंगवालों की कोठी, थपलियाललो, दयुंडियो व पैन्यूलीयों के भवन थे, जो कलात्मक होने के साथ ही सुरक्षा की दृष्टि से भी उत्तम थे। वर्ष 1910 की मनुष्य गणना के अनुसार उस वक्त टिहरी शहर की आबादी 4000 हजार थी। 1991 में जनसंख्या 15730 थी।
कई मोहल्लों में बंटा था टिहरी शहर
टिहरी शहर बसने से लेकर अंतिम समय तक उसमें कई बदलाव आए। शहर कई मोहल्लों में बंटा हुआ था। कुछ मोहल्लों के नाम राजा के समय के थे तो कुछ बाद में अस्तित्व में आए। अहलकारी मोहल्ला, पुर्वियाणा मोहल्ला, संगम रोड, सेमल तप्पड़, सत्तेश्वर मोहल्ला, मुस्लिम मोहल्ला, सुमन चौक, भंगियाणा मोहल्ला, पश्चिमीयाणा मोहल्ला, स्वास्तिक कम्पाउन्ड के पास लखेड़ा मोहल्ला, पुराना दरबार, घनसाली रोड, घंटाघर, भादू की मगरी। इसके साथ ही 1985-86 में बांध के लिए बनाई गई सुमन कालोनी, मोतीबाग कालोनी, जल निगम कालोनी, प्रदर्शनी मैदान कालोनी आदि।
टिहरी शहर के साथ इन गांवों का भी खत्म हुआ अस्तित्व
टिहरी शहर के साथ ही पट्टी अठूर के जोगीयाणा, खांड (मथ्या व बिल्ला), सुनार गांव, थपला, बागी, पजौं (पजाऊं), बेलग्राम, पडियार गांव, भगवतपुर, धारमंडल पट्टी के डोब, रामपुर गांव भी झील में डूब गए। इसके बाद भागीरथी घाटी के मालीदेवल, सिंरई, गोदी, राजगांव, गोरण, पलास, छाम, भिलंगना घाटी के लमपोंगडी, देवल आदि गांव भी विस्थापित हुए, यह गांव भी झील में समा गए।
2005 में हुआ अस्तित्व समाप्त
साल 1965 में तत्कालीन केन्द्रीय सिंचाई मंत्री केएल राव ने टिहरी बांध बनाने की घोषणा की। 29 जुलाई 2005 को टिहरी शहर में पानी घुसा। अक्टूबर 2005 से टिहरी डैम की टनल दो बन्द की गई और पुरानी टिहरी शहर में जल भराव शुरू हो गया।
सर्वाधिकार सुरक्षित।
प्रकाशित…..31/12/2020
नोट: 1. उक्त रचना को कॉपी कर अपनी पुस्तक, पोर्टल, व्हाट्सएप ग्रुप, फेसबुक, ट्विटर व अन्य किसी माध्यम पर प्रकाशित करना दंडनीय अपराध है।
2. “शब्द रथ” न्यूज पोर्टल का लिंक आप शेयर कर सकते हैं।
