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गढ़वाली कवि सम्मेलन में दिखे पहाड़ के कई रंग

देहरादून, 21 जुलाई: धाद की ओर से हरेला पर्व के उपलक्ष्य में रविवार को गढ़वाली कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कवियों ने रचनाओं के माध्यम से पहाड़ की पीड़ा गाकर लोगों को झकझोर दिया तो दूसरी तरफ हास्य कवियों ने लोगों को खूब हंसाया। इस मौके पर शिवदयाल शैलज के काव्य संग्रह ‘छ् वाया नि सूखा’ का लोकार्पण भी किया गया।
रेसकोर्स स्थित आफिसर्स ट्रांजिट हास्टल में आयोजित कवि सम्मेलन का शुभारंभ सरस्वती वंदना से हुआ। हरीश कंडवाल ने ‘चला दगड्यों हरेला मनोला, डाली लगे औला डाली लगे औला’ से पेड़ों का महत्व समझाया तो शांति बिंजोला ने ‘माया की पठली मा खैरयूं की’ से लोगों को झकजोरा। शांति प्रकाश जिज्ञासू ने ‘डोला ठस्के किए छै जब गौं मां, हथ हथ्यूं मा रांटि छै गिंजली’ सुनाई। वहीं, चंद्रदत्त सुयाल ने ‘चला भुलों अपणा पहाड़ जौला झुमैलो’ से अपनी मिट्टी से जुड़ने का आह्वान किया। सुरेश स्नेही ने ‘मेरा दिन त टरकण्यू मां काटेगिन सदानि’ अरुण थपलियाल ने ‘रिषिकेश बटिन चलली कर्णप्रयाग, क्या चलली कन चलली’ से पहाड़ में रेल की आहट से यातायात की पीड़ा बयान की। कार्यक्रम में लक्ष्मण सिंह रावत, बीना बेंजवाल, अभिषेक, गोपाल बिष्ट, मधुर वादिनी, दिनेश डबराल, शिवदयाल शैलज, बलबीर राणा ने भी काव्य पाठ किया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि लोकेश नवानी, धाद लोकभाषा एकांश की अध्यक्ष बीना कंडारी, सचिव प्रेमलता सजवाण, तन्मय ममगाईं रमाकांत बेंजवाल, डी सी नौटियाल, बृजमोहन उनियाल, कुलदीप कंडारी, तन्वी पाल, विजय जुयाल आदि मौजूद थे।

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