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पहाड़ में इगास मनाएं, मातृभूमि का मान बढाएं

जी हाँ आज “ईगास बग्वाल” है ,,
हम पहाडी गढ़वालियों का महत्वपूर्ण त्यौहार ,,कुछ यादें फिर पहाड़ की तजा हो जाती हैं,,और जब बात त्योहारों की हो तो अपने बचपन में माँ बाप और भाई बहिनो के संग बिताये हर एक त्यौहार का याद आना लाजमी है,,क्यूंकि तब त्यौहार मतलब ख़ुशी ,अपनापन,, एक दूसरे के लिए प्रेम सब झलकता था ,,जी हाँ दीपावली सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है हम पहाड़ियों के लिए ,,
दीपावली के ठीक ग्यारहवें दिन बाद गढ़वाल में एक और दीपावली मनाई जाती है इसी को “ईगास बग्वाल” कहा जाता है,,बिलकुल दीपावली के दिन जैसा ही इस दिन भी पूरी पकोड़ी ,,और पालतू जानवरों के लिए विशेषकर गोवंश को ” पींडा” जो हमने देखा माँ झंगोरे को पकाकर या चांवल को पकाकर नमक डालकर उसके गोले बनाती थी जिसमे हम भी मदद करते थे,,ऊपर से फूल रखकर गोवंश की पूजा उनका टीका करके पिण्डा अपने हाथों से खिलाया जाता है,, रात का इंतजार होता था भेलो खेलने के लिए,
बड़ी बग्वाल की तरह इस दिन भी दिए जलाते हैं, पकवान बनाए जाते हैं। यह ऐसा समय होता है जब पहाड़ धन-धान्य और घी-दूध से परिपूर्ण होता है। बाड़े-सग्वाड़ों में तरह-तरह की सब्जियां होती हैं। इस दिन को घर के कोठारों को नए अनाजों से भरने का शुभ दिन भी माना जाता है। इस अवसर पर नई ठेकी और पर्या के शुभारम्भ की प्रथा भी है। इकास बग्वाल के दिन रक्षा-बन्धन के धागों को हाथ से तोड़कर गाय की पूंछ पर बांधने का भी चलन था। बैलों के सींगों पर तेल लगाने, गले में माला पहनाने उनकी पूजा करते हैं। इस बारे में किंवदन्ती प्रचलित है कि ब्रह्मा ने जब संसार की रचना की तो मनुष्य ने पूछा कि मैं धरती पर कैसे रहूंगा? तो ब्रह्मा ने शेर को बुलाया और हल जोतने को कहा। शेर ने मना कर दिया। इसी प्रकार कई जानवरों पूछा तो सबने मना किया। अंत में बैल तैयार हुआ। तब ब्रह्मा ने बैल को वरदान दिया कि लोग तुझे दावत देंगे, तेरी तेल मालिश होगी और तुझे पूजेंगे।
पींडे के साथ एक पत्ते में हलुवा, पूरी, पकोड़ी भी गोशाला ले जाते हैं। इसे ग्वाल ढिंडी कहा जाता है। जब गाय-बैल पींडा खा लेते हैं तब उनको चराे अथवा गाय-बैलों की सेवा करने वाले बच्चे को पुरस्कार स्वरूप उस ग्वालढिंडी को दिया जाता है।
लोकमान्यताओं के अनुसार गढ़वाल में भगवान राम के अयोध्या लौटने की खबर 11 दिन बाद मिली थी ,, इसलिए यहाँ ग्यारह दिन बाद दीवाली मनाई जाती है ,, इसी प्रकार रिख बग्वाल मनाये जाने के पीछे विश्वास कि राम के अयोध्या लौटने की सुचना उन इलाकों में एक माह बाद मिली,,एक और मान्यतानुसार
अनुसार दिवाली के समय गढ़वाल के वीर माधो सिंह भंडारी के नेतृत्व में गढ़वाल की सेना ने दापाघाट, तिब्बत का युद्ध जीतकर विजय प्राप्त की थी और दिवाली के ठीक ग्यारहवें दिन गढ़वाल सेना अपने घर पहुंची थी। युद्ध जीतने और सैनिकों के घर पहुंचने की खुशी में उस समय दिवाली मनाई थी। रिख बग्वाल के बारे मेही कहा जाता है कि सेना एक महीने बाद पहुंची और तब बग्वाल मनाई गई और इसके बाद यह परम्परा ही चल पड़ी। ऐसा भी कहा जाता है कि बड़ी दीवाली के अवसर पर किसी क्षेत्र का कोई व्यक्ति भैला बनाने के लिए लकड़ी लेने जंगल गया लेकिन उस दिन वापस नहीं आया इसलिए ग्रामीणों ने दीपावली नहीं मनाई। ग्यारह दिन बाद जब वो व्यक्ति वापस लौटा तो तब दीपावली मनाई और भैला खेला।
भेलो खेलने का विशेष महत्त्व इस दिन ,,इसको बनाने के लिए सबसे पहले भ्यूंल( भीमल )की छाल या जंगली बेलें ली जाती है जो रस्सी का काम करती ,,उसके एक छोर पर चीड़ की लिसायुक्त लकड़ी और साथ ही भीमल के क्येडे(बारीक़ सूखी लकड़ी ) बांधकर उसे जलाया जाता है ,,जिसे भेलो कहते ,,हमने देखा जब छोटे थे पांडव खोले में एक बहुत बड़ा भेलो बनाया जाता था जिसे बारी बारी से सब घुमाते थे और एक खेल भी साथ के लड़के या चाचा लोग उसके ऊपर से उछलते थे बड़ा मजा आता था देखने में ,,फिर सभी अपना अपना भेलो लेकर खुले खेतों में घुमाते हुए खेलते,,,जब दूर दूसरे गांव में देखते तो अंधेरे में जुगुनुओं की बारात सी लगती ,,,पर अब दुर्लभ होता जा रहा यह सब देखना ,,चलिए इस बार से या फिर अगली बार से अपने गांव चलें भेलो खेलने और उन जुगुनुओं की बारात संग शामिल हो बिखरता गढ़वाल फिर समेट लें ,,,फिर एक बार आबाद कर अपना गांव मिलकर उसकी अपनी पहचान दिलाएं ,,,चलिए त्यौहार तो कम से कम अपने अपनों के बीच मनायें।।।

“दीप”

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