कवि डॉ सत्यानंद बडोनी की एक रचना.. इंसान
डॉ सत्यानंद बडोनी
देहरादून, उत्तराखंड
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इंसानियत
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इंसान
इंसान होते हुए भी
पग- पग पर बदल ले रहा पैंतरा
वेष-भाषा
पशु-पक्षी जहाँ कही भी हों
एक होती है वेष-भाषा
रूप रंग
वे पैंतरा, वेष-भाषा, रूप-रंग
नहीं जानते हैं बदलना
वे जो हैं
वही रहना चाहते हैं
उन्हें अपना भूँ-भूँ, चीं-चीं
अच्छा लगता है
गधा डैंचू-डैंचू, कुत्ता भौ-भौं
करना नहीं भूलता
पर्याय बने है, अनादिकाल से
स्वामी भक्ति के
वे आदमियत की उपाधि से
नहीं होना चाहते है
अलंकृत
घृणा करते हैं वे इन्सानियत से
वे नहीं होना चाहते है इन्सान
उन्हें गर्व है अपने पशु होने पर
कि वे जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद से
कोसों दूर हैं
इसलिए वे इन्सान नहीं पशु है
वे एक ही जीवन जीते है
वे नहीं जीते, इन्सानों की तरह
मुखौटा लगा के, दो जिन्दगी।।

