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कवि/गीतकार वीरेन्द्र डंगवाल “पार्थ” की ‘समय’ पर एक रचना

वीरेन्द्र डंगवाल “पार्थ”
देहरादून, उत्तराखंड
13 मई 2026
9412937280


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समय

बहुत बड़े बलवान तुम्हीं तो,
जीत कभी बन जाते हार।
प्रतिफल चलते ही जीवन में
बनते तुम्हीं मृदुल बयार।
दुख भी लाते साथ तुम्हीं हो
कटुता के ही संग विषाद।
राह दिखाते कभी रोकते
ऊंचाई पर बढ़ते पाद।।1।।

बचपन में वो माटी का घर
पानी में कागज़ की नाव।
दिनभर खेल रंग रंगीले
रजनी में मिलता ठहराव।
पल में तोला पल में माशा
तेरा ही यह रूप अनूप।
निश्चलता चंचलता ऐसी
खिलती अपनेपन की धूप।।2।।

यौवन की कच्ची गलियों में
पुलकित मन में होता मीत।
लग जाते हैं पंख पांव में
जीवन बन जाता संगीत।
तुम्हीं आस विश्वास जगाते
पकड़ाते सपनों की डोर।
तन मन उल्लासित हो जाता
सफल हो जाते चंहुओर।।3।।

जीवन के अनुभव की गठरी
गांठे सोच समझ कर खोल।
पाया भी है खोया भी है
कितने ये मोती अनमोल।
कोमल हुए कभी कुसुम से
बनना भी पड़ता है खार।
साथ साथ चलकर तुमने ही
सिखलाया जीवन का सार।।4।।

बचपन यौवन और बुढ़ापा
पल पल का लेते संज्ञान।
गलती भी करवा जाते हो
उसी रूप दे जाते ज्ञान।
साथी बनकर साथ निभाते
हर चाहत होती साकार।
हाथ जोड़कर नतमस्तक हूं
समय तुम्हारा है आभार।।5।।

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