भर पेट खाना खाऊँगी आज, चाह ऐसी जगी मन में कुछ आज
डॉ अलका अरोड़ा
प्रोफेसर, देहरादून
————————————–

चित्र कुछ कहता है…कुछ यूँ भी
————————————————-
भर पेट खाना खाऊँगी आज
चाह एसी जगी मन मे कुछ आज
और दिन से ज्यादा कमाऊँगी
मेहनत दुगने से कुछ करुँगी आज।
सोच कर कदम कुछ तेज हुए हैं
नन्हे बच्चों के मुख उद्धृत हुए हैं
बेजान वृद्घ भी याद आ गए
स्मृतियों के ताने-बाने जुड़े हैं।
देख छटा कुछ दुनियाँ की
रंग बिरंगी इस धरा की
मन फिर से आशावान हुआ है
कर्मशील वो फिर बढ़ा है।
हाथ लिए हूं साज श्रृंगार
मेरे लिए जीवन का आधार
जितना ज्यादा बिक जायेगें
उतना फलेगा मेरा घर द्वार।
आओ हम भी प्रण करें सब
चीज विदेशी छोड़ें आज अब
राष्ट्रहित की ओर बढ़े कदम
इनकी भी हो जाए मदद।
