फिल्मों में ही नहीं, असल जिंदगी में भी होते हैं जोगी ठाकुर…ऋषिकेश मुखर्जी की याद में।
ढोल बजने से जहां हर किसी का नाचने-गाने का मन हो उठता है। वहीं, किसी-किसी को एक फिल्म भी जरूर याद आ जाती होगी। 60 -70 के दशक में बनी ऋषिकेश मुखर्जी निर्देशित ‘आशीर्वाद’। इस फ़िल्म में अशोक कुमार ने जोगी ठाकुर का किरदार निभाया था। फिल्म की कहानी दो ही बातों पर केंद्रित है। पहली! कठोर दिल जमींदारिन रानी मां के संगीतप्रेमी पति जोगी ठाकुर का अपनी जमींदारी के आम लोगों के साथ प्यार से रहना और हँसी-खुशी के मौके पर सबके बीच घुल-मिल जमकर ढोल बजाना..फिर चरित्रहीन मुंशी के कत्ल के इल्जाम में कैद जोगी ठाकुर का बरसों बाद अपनी इकलौती बेटी की शादी पर उसे आशीर्वाद देने गांव में पहुंचना। बेटी बिचारी आम गरीब लोगों की तरह ही पैदल चलकर आ रहे विपन्न, बुखार से तपती जर्जर काया वाले बड़ी दाढ़ी और एक मोटा सा कंबल लपेटे अपने पिता जोगी ठाकुर के हाथ में भी दान की चवन्नी रख रही है। फैला हुआ हाथ उलट बेटी के सिर पर रख जोगी ठाकुर विदा हो रहे हैं, अपनी पहचान उजागर किए बिना ही। लेकिन, जिस ढोल वाले की बेटी की इज्जत बचाने को उनके हाथों मुंशी का कत्ल हो गया था, वही जोगी ठाकुर को पहचान लेता है।
जोगी ठाकुर के नाम का हल्ला होते ही सारा गांव जुट जाता है उन्हें देखने। अंतिम घड़ियां गिन रहे जोगी ठाकुर की आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए इधर कोई ढोल बजा रहा है तो उधर उनकी आंख मुंदने से पहले उन्हें बाबा कहकर पुकारती दुल्हन बेटी भी पहुंच जाती है उनके पास। अशोक कुमार का ऐसा जीवंत अभिनय कि कौन ऐसा दर्शक होगा जो रो न पड़े आखिरी दृश्य में बरसते आसमान की तरह!
हां ! ये ढोल वाले ही तो हैं जो हर बार याद दिला जाते हैं मुझे ऋषिकेश मुखर्जी और ‘आशीर्वाद’ की। आँखे कसकर मूँदे हुए तन्मयता से ढोल बजाने में जिनको किसी के उनके पास आने का पता नहीं चलता। हर महीने गेट पर ढोल बजाकर संक्रांति या फिर किसी भूले बिसरे तीज-त्यौहार की याद दिलाने आए को तल्लीनता से सुनती सोच रही हूं कि खिचड़ी दाढ़ी वाला पतला सा काला, झुर्रीदार चेहरे वाला ये वृद्ध इतनी धूप में न जाने कहां-कहां से भटक कर इस दरवाजे तक आया होगा। माथे से गिरता सूखे पपड़ीदार होठों तक पहुंचता पसीना यही दूरी बयां करता है शायद। विधाता के रचे इस किरदार के चेहरे पर जीवन के मुश्किल हालात और कठिन झंझावात का सहज विन्यास बताता है कि जोगी ठाकुर फिल्मों में ही नहीं असल जिंदगी में भी होते हैं। गरीबी, सूदखोरी और जात-पात की प्रथा पर भी करारी चोट करते ऋषिकेश मुखर्जी की आशीर्वाद नजदीक से आती ढोल की भारी-भरकम आवाज में यही तो पूछती है आज भी कि ‘दूर के ढोल जितने सुहावने, पास के उतने ही डरावने क्यों’?
ऋषिकेश मुखर्जी की पुण्यतिथि पर ‘प्रतिभा की कलम’ से याद ‘आशीर्वाद’ की
