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कांवड़ की पुराणों में क्या हैं मान्यताएं, कहां-कहां से निकलती है

जानना अहम है कि आखिर कांवड़ यात्रा होती क्या है? इस यात्रा से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं और इतिहास क्या है? यह यात्रा कहां से शुरू होती है और किन-किन मार्गों से होते हुए कहां पहुंचती है? इनमें सबसे लोकप्रिय कांवड़ यात्रा कहां होती है? 

शब्द रथ न्यूज (ब्यूरो) देहरादून। सावन की शुरुआत के साथ ही कांवड़ यात्रा शुरू हो गई है। इस 30 जुलाई से 11 अगस्त तक लाखों की संख्या में केसरिया वस्त्र धारण कर कांवड़िए गंगा का पवित्र जल लेकर भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों और  लोकप्रिय मंदिरों में पहुंचेंगे और जलाभिषेक करेंगे। उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार और झारखंड तक अलग-अलग सरकारों ने कांवड़ियों की सुरक्षा के लिए इंतजाम किए हैं।

कांवड़ यात्रा हर वर्ष सावन के महीने में शुरू होती है। इस साल यह यात्रा 11 जुलाई से शुरू हो रही है। यात्रा में केसरी वस्त्र में कांवड़िए नंगे पैर चलकर उत्तर और पूर्व भारत में गंगा नदी से जल लेकर भगवान शिव के मंदिरों और ज्योतिर्लिंगों में चढ़ाते हैं। कांवड़िए गंगा नदी से जल लेने के लिए बड़ी संख्या में उत्तराखंड के गौमुख, गंगोत्री और हरिद्वार पहुंचते है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के प्रयागराज, वाराणसी में भी जल लेने के लिए कांवड़िए पहुंचते हैं। बिहार का सुल्तानगंज भी कांवड़ियों के जल लेने का केंद्र है।इसके अलावा कांवड़िए बाराबंकी और अयोध्या से बहने वाली घाघरा नदी (जिसे सरयू के नाम से भी जाना जाता है) से भी जल लेकर भगवान शिव के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों और मंदिरों में जल अर्पित करने के लिए पहुंचते हैं।

कहां से होकर गुजरती है कांवड़ यात्रा
कांवड़ यात्रा अधिकतर कई किलोमीटर की होती है। जहां उत्तर भारत में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रहने वाले लोग गंगाजल लेने के लिए उत्तराखंड में गंगा से जल लेने पहुंचते हैं, वहीं अवध क्षेत्र और पूर्वी भारत में भक्त प्रयागराज, वाराणसी और अयोध्या या आसपास के क्षेत्रों से जल लेते हैं। बिहार के भागलपुर जिले में आने वाले सुल्तानगंज से भी गंगाजल लेने हजारों की संख्या में कांवड़िए पहुंचते हैं। कांवड़िए लंबी और दुष्कर यात्रा को गंगा के करीब मौजूद ज्योतिर्लिंग और प्रचलित मंदिरों में शिवलिंग को अर्पित करते हैं। जहां उत्तर भारत के लोग इस जल को मेरठ में पड़ने वाले मंदिरों- औघड़नाथ मंदिर, पुरा महादेव (मेरठ), दुधेश्वर नाथ मंदिर (गाजियाबाद) में अर्पित करते हैं तो अवध क्षेत्र और पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग जल को बाराबंकी स्थित लोधेश्वर महादेव मंदिर, अयोध्या के क्षीरेश्वर महादेव मंदिर में चढ़ाते हैं। इसके अलावा दो अहम ज्योतिर्लिंग- बनारस में मौजूद काशी विश्वनाथ मंदिर और झारखंड के देवघर में बाबा बैद्यनाथ मंदिर में देशभर से जलाभिषेक के लिए आने वाले कांवड़ियों की भारी भीड़ जुटती है। कुछ कांवड़िए इस यात्रा में झारखंड के दुमका जिले में स्थित बाबा बासुकीनाथ धाम भी जाते हैं।

कौन से मार्ग तय हैं कांवड़ियों के लिए 
उत्तर प्रदेश कांवड़ यात्रा के लिए मुख्य केंद्र है। यहां कांवड़िये पश्चिमी यूपी के मुजफ्फरनगर, बागपत, मेरठ, बुलंदशहर, गाजियाबाद से लेकर अवध के लखनऊ, बाराबंकी होते हुए पूर्वी यूपी के मिर्जापुर तक से अहम मंदिरों तक जाते हैं। इस दौरान उत्तर प्रदेश में कांवड़िए अधिकतर दिल्ली-मुरादाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग-24, हापुड़-मुजफ्फरनगर से होते हुए दिल्ली-रुड़की राष्ट्रीय राजमार्ग-58 के जरिए जाते हैं। इसके अलावा दिल्ली-अलीगढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग-91, अयोध्या-गोरखपुर राजमार्ग और प्रयागराज-वाराणसी हाईवे भी कांवड़ियों के मार्गों में शामिल हैं।

क्या है कांवड़
गंगा से पानी लेने के बाद कांवड़िए लकड़ी की बनी कांवड़ कंधे पर उठाते हैं, इसके जरिए गंगा का पानी लेकर भगवान शिव के प्रसिद्ध मंदिरों और ज्योतिर्लिंगों की यात्रा करते हैं। इसी जल से बाद में भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है। इसके अलावा कांवड़िए अपने गांव या शहर में मौजूद भगवान शिव के मंदिर में भी जलाभिषेक करते हैं।

कांवड़ यात्रा के नियम
कांवड़ को लेकर कुछ सख्त नियम भी हैं। जैसे- एक बार जल लेकर कंधे पर उठाए जाने के बाद कांवड़ को जमीन पर नहीं रखा जाता है। हालांकि, इन नियमों में पहले के मुकाबले कुछ ढील भी दी गई है। इसके अलावा पहले एक-दो या चार लोग ही साथ में कांवड़ लेकर निकलते थे। हालांकि, बीते वर्षों में कुछ हादसों और बाधाओं के मद्देनजर अब इस यात्रा को नियमति करने के लिए कांवड़िए चार-पांच टोलियां बनाकर चलते हैं। इससे रास्ते में किसी कांवड़िए को परेशानी होने की स्थिति में बाकी लोग कांवड़ का ध्यान रखते हैं।

कांवड़ यात्रा से जुड़ी धार्मिक मान्यताएं
कांवड़ यात्रा का इतिहास पौराणिक काल का है। मान्यता है कि इसका आधार ‘समुद्र मंथन’ से है, जिसका जिक्र विष्णु पुराण में मिलता है। जब देवताओं और असुरों ने अमृत पाने के लिए समुद्र का मंथन किया था। इस दौरान मंथन में हलाहल या विष भी निकला था। इस हलाहल से जब धरती में आग लगने लगी, तब भगवान शिव ने इस विष को पी लिया, ताकि इसे फैलने से रोका जा सके। जैसे ही भगवान शिव ने विष पीया, देवी पार्वती ने उनके कंठ को पकड़ लिया, ताकि विष को वहीं रोका जा सके और भगवान के अंदर मौजूद विश्व को प्रभावित होने से रोका जा सके। भगवान शिव का गला इस विष की वजह से नीला पड़ गया, जिसके बाद उन्हें नीलकंठ (जिसका कंठ नीला हो) कहा गया। लेकिन इसके बावजूद विष का प्रभाव उनके पूरे शरीर पर हुआ। मान्यता है कि विष के इसी प्रभाव को कम करने के लिए कांवड़िए हर वर्ष सावन के महीने में भगवान शिव के मंदिरों और ज्योतिर्लिंगों में पहुंचकर जलाभिषेक करते हैं।

रावण, परशुराम और भगवान राम से भी जुड़ी पौराणिक मान्यता

भगवान शिव द्वारा विष पिए जाने के बाद इसका प्रभाव उनके शरीर पर पड़ा। इसके बाद की कहानी पहुंचती है त्रेता युग, जब प्रभु के अनन्य भक्त रावण ने भगवान शिव की साधना की और ध्यान लगाया। इस दौरान रावण ने पुरा महादेव में शिवलिंग पर पवित्र गंगाजल चढ़ाया, जिससे भगवान शिव विष के नकारात्मक असर से मुक्त हो गए। माना जाता है कि शिवलिंग पर जल चढ़ाने की शुरुआत यहीं से हुई। एक और मान्यता भगवान परशुराम से जुड़ी हुई है। भगवान शिव के भक्त परशुराम को ही कांवड़ यात्रा की शुरुआत करने वाला भी माना जाता है। मान्यता है कि जब भगवान शिव की उपासना के लिए परशुराम पुरा के पास थे, तो यहां उन्हें प्रभु का मंदिर बनाने का ख्याल आया। इसके बाद वे सावन में हर सोमवार को गंगाजल लाकर भगवान शिव की साधना करते थे। एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम ने भी कांवड़ यात्रा की थी। कहा जाता है कि उन्होंने बिहार के सुल्तानगंज से गंगाजल भरकर देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। इसे भी कांवड़ यात्रा के शुरुआती चरणों में से माना जाता है।

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