कवि तारा पाठक की नववर्ष पर एक कुमाऊनी कविता … नौं सालै बधाइ
तारा पाठक
हल्द्वानी, उत्तराखंड

—————————————————–
नौं सालै बधाइ
बधाइ हो नईं साल ऐ रौ।
रीत निभूंणै भै, बधाइ दिणै भै।
बरस दिनन जो बचि रौला
उनन धैं मिलणै भै।
कुशौ बात पुछणै भै
कस छा, के हाल है रौ।
बधाइ हो नईं साल ऐ रौ।
क्वे अफुली रीं, डीजे में नाचणी।
नौं लुकुड़ पैरि केक लै काटणी।
जनार के समर्थ न्है।
नौं पुराणौं अर्थ न्हैं।
उं कुणी यो लै एक बबाल ऐ रौ।
जास छ्यां, उसै छां
फिर कसी कूनूं नईं साल ऐ रौ।
पैंली बै जै भाल दिन छी।
नैं कैकै ल्ह्यण,नैं द्यण छी।
लाट कालां पाई जांछी।
दस दस नान समाई जां छी।
आज एक्कै कै मलाल है रौ।
बड़ कठिन नईं साल ऐ रौ।
महंगाई नाच नाचणै।
पुछड़ि उठै बेर भाजणै।
रुपैं क्वे गत न्हैं।
चीजन में सत न्हैं।
जतु में पुर कबिल ढकीं छी
उतु में रुमाल ऐ रौ ।
के खै के पैरि कूनूं नईं साल ऐ रौ।
कैकै गाल फुस्यार है रीं।
कैकै थोव तुस्यार है रीं।
क्वे ओसै बेर गदु जस
क्वे सुकि कुस्म्यार है रीं।
कैकै चिमोड़ी चामोड़ी ल्वात
क्वे मोटै बेर दोखाल है रीं।
सोचौ धैं जरा कै हुं नईं साल ऐ रौ।
फिर लै एक अर्ज करनूं।
द्वि बोल खर्च करनूं।
पौ परबी मनूंनै रया।
बधाइ-अशीष दिनै रया।
जनन उमंग ऐजैं उं कूनी-
बिन डबलौ गुलाल ऐ रौ।
तुम कसी नि कौला नईं साल ऐ रौ।
जतु दिनै पराणि छ,
र्वे ध्वे के काटण छ।
द्वि दिनै रंग रमोव भै।
क्वे आज त क्वे भोव गै।
नाचि कुदि ल्हियो भुली
कस जै धमाल ऐ रौ।
एक बारि खित्त कनै कै दियो –
बधाइ हो नई साल ऐ रौ।

