देवभूमि में देवभाषा की दुर्दशा: संस्कृत विद्यालय और महाविद्यालय किए जाएं अलग-अलग : बिजल्वाण
देहरादून। उत्तराखंड में संस्कृत भाषा और संस्कृत शिक्षा की स्थिति दयनीय है। इन्हें सुधारने के लिए सबसे पहले संस्कृत विद्यालय और महाविद्यालय को अलग अलग किया जाना अवश्य है। संस्कृत विद्यालय महाविद्यालय शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष डॉ राम भूषण बिजल्वाण ने यह बात संघ के ऑनलाइन अधिवेशन में कही। बिजल्वाण ने कहा कि उत्तराखंड में संस्कृत द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया गया है। लेकिन, इसके विकास के लिए काम नहीं हो रहा है। यह चिंता का विषय है।

प्रांतीय संस्कृत विद्यालय महाविद्यालय शिक्षक संघ ने वर्चुअल अधिवेशन आयोजित किया। अधिवेशन में वक्ताओं ने कहा कि खुद को संस्कृत और संस्कृति का हितैषी बताने वाली भाजपा सरकार राज्य में है। लेकिन, संस्कृत शिक्षा की मूल समस्याओं का निराकरण आज तक नहीं हो पाया है। भाजपा सरकार ने पिछले कार्यकाल में संस्कृत को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया था। बावजूद इसके धरातल पर संस्कृत हित में जो महत्त्वपूर्ण काम होने चाहिए थे, वो आज तक नहीं हो पाए हैं।
अधिवेशन में 13 जनपदों की कार्यकारिणी, संस्कृत विद्यालयों के प्राचार्य-प्रधानाचार्य व शिक्षकों ने भाग लिया। साढ़े तीन घंटे चले वर्चुअल अधिवेशन में सर्वसम्मति से जो बिंदु आये है उन पर कार्य करने के लिए सरकार का ध्यान आकर्षित किया गया है। अधिवेशन में प्रमुख रूप से पूर्व कार्यकारिणी के पदाधिकारी डॉ शैलेंद्र डंगवाल, डॉ ओम प्रकाश पूर्वाल, डॉ संतोष मुनि, डॉ सोहन बलूनी, प्रदेश संयोजक दर्वेश्वर थपलियाल, प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ हर्षमणि रतूड़ी, प्रदेश संरक्षक डॉ राजेन्द्र गैरोला, डॉ कीर्तिबल्लभ जोशी, डॉ नित्यानंद पोखरियाल, कोषाध्यक्ष सुनील बिजल्वाण, प्रचार मंत्री डॉ मुकेश खंडूड़ी, डॉ विद्या नेगी, डॉ कुलदीप पंत, अल्मोड़ा के जिलाध्यक्ष डॉ महेश जोशी, नैनीताल के अध्यक्ष डॉ हरबोला, डॉ हरीश रतूड़ी, डॉ भुवन जोशी आदि मौजूद रहे।

इन बिंदुओं पर सरकार का ध्यान किया आकृष्ट
1:- संघ की मांग है कि सबसे पहले प्रदेश में एक साथ संचालित हो रही माध्यमिक, उच्चशिक्षा विद्यालय और महाविद्यालयों को अलग-अलग संचालित किया जाय है। सरकार से मांग की गई कि इनको शीघ्र अलग अलग किया जाय। इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट गाइडलाइंस हैं कि किसी भी सूरत में माध्यमिक व उच्च शिक्षा एक साथ संचालित नहीं होगी, फिर भी सरकार संज्ञान नहीं ले रही है। वर्तमान में शासन स्तर पर वर्गीकरण के विषय में जो कार्यवाही गतिमान है, उसको इसी सत्र में लागू किया जाय, जो कॉलेज महाविद्यालय की श्रेणी में आ रहे हैं, उनसे तत्काल माध्यमिक कक्षाओं को हटाया जाय।
2:- उत्तराखंड में संस्कृत शिक्षा में माध्यमिक स्तर का जो नया पाठ्यक्रम लागू किया गया है, जिसमें संस्कृत के मूल विषयों को खत्म किया गया है। यह पाठ्यक्रम संस्कृत छात्रों के हित में नहीं है, जिसका विरोध किया जा रहा है। सबकी तरफ से यह बात आई है कि जब तक पाठ्यक्रम को छात्रहित में सुधार नहीं किया जाता तब तक इसको न पढ़ाया जाएगा, न ही लागू किया जाय।
3:-अधिवेशन में सामूहिक रूप से बात आयी है कि संस्कृत शिक्षा निदेशालय और संस्कृत शिक्षा बोर्ड में सहायक निदेशक और उप निदेशक के पद पर जो माध्यमिक शिक्षा से प्रतिनियुक्ति पर आए हैं, उनको शीघ्र वापस अपने मूल पदों पर भेजा जाय।
4:- संस्कृत शिक्षा परिनियम 2015 जिस पर अभी तक रोक लगी हुई है, उसमें संस्कृत शिक्षा और शिक्षकों के हित में आवश्यक संशोधन कर उसको शीघ्र प्रख्यापित किया जाय।
5:- प्रदेश के संस्कृत महाविद्यालय जो वर्षों से उच्चशिक्षा पढ़ा रहे हैं, उनको आज तक उच्चशिक्षा का लाभ नहीं दिया गया है। उनके लिए अलग से परिनियमावली शीघ्र बनाई जाय।
6:- नई शिक्षा नीति में संस्कृत के लिए अच्छे अवसर दिए हैं इसलिए उत्तराखंड में संस्कृत को प्राथमिक से उच्चशिक्षा स्तर तक अनिवार्य होना चाहिए। शिक्षा नीति में दिए गए प्रावधान धरातल में उसी रूप में लागू होने चाहिये।
7:- संस्कृत विद्यालय-महाविद्यालयों में वर्षों पहले जो पद सृजित हुये थे आज भी वही है, जिनकी संख्या बहुत कम है। मानकों के हिसाब से और पद सृजित किये जाय, पदोन्नति के लिए कोई प्रावधान नही है जो संस्कृत शिक्षकों के साथ घोर अन्याय है। वर्षों से एक ही पद पर कार्यरत शिक्षकों पदोन्नति दी जाय।
8:- प्रदेश के अधिकांश संस्कृत कॉलेजों में वर्षों से कार्यवाहक प्रधानाचार्य काम कर रहे है उनको प्राचार्य पद का पूरा लाभ दिया जाय।
9:- संस्कृत निदेशालय और परिषद में माध्यमिक शिक्षको के बदले संस्कृत विद्यालय-महाविद्यालय के शिक्षकों को प्रतिनियुक्ति पर जाने का रास्ता खोला जाय जिसके लिए शासनादेश निर्गत होना चाहिए।
11:- संस्कृत शिक्षा का दुर्भाग्य है कि राज्य शैक्षिक सम्मान से पुरुस्कृत होने वाले शिक्षकों को दो वर्ष की अतिरिक्त सेवा का लाभ देने का स्पष्ट शासनादेश होने के बाद भी सेवविस्तार नही दिया जा रहा है।
12:- कई संस्कृत विद्यालयों को इंटरमीडिएट स्तर के होने के बाद भी आज तक इंटरमीडिएट स्तर का वेतनलाभ नही दिया जा रहा है।
13 :- इस कोरोनाकाल के संकट में भी संस्कृत शिक्षा के स्थायी शिक्षकों तीन महीने से वेतन नही मिला है और प्रबन्धकीय व्यवस्था के तहत कार्य करने वाले शिक्षकों को फरबरी 2020 से मानदेय नहीं मिला है। वेतन शीघ्र निर्गत किया जाय।
संस्कृत की फाइलें जान बूझकर रोकी जाती हैं
अधिवेशन में संघ के प्रांतीय महामंत्री डॉ नवीन जोशी ने कहा कि भाजपा की सरकार होने के बाद भी शासन के कुछ अधिकारी संस्कृत शिक्षा से सम्बंधित फाइलों को जबरन रोकते हैं। तमाम समस्याएं शासन स्तर पर लंबित है, जिनका निराकरण होना आवश्यक है। उन्होंने सरकार से मांग की कि समस्याओं का शीघ्र निराकरण किया जाय।
