सातवें आसमान पर थी मैं कि मेरे पेड़ पर भी है घोंसला
घोंसला
फूल कहीं भी खिलते हों उन पर नजर पड़ गयी तो बरबस वहां ठहर ही जाती है , चाहे वो किसी झाड़ी पर ही क्यों न लटकते हों। हां ऐसे ही मेरा मन भी अब रोज-रोज अटकने लगा उस झाड़ी पर जो मेरे घर के ठीक सामने वाले प्लॉट पर उगी हुई थी। मन होता था कि जाकर छू आऊं कभी उसे भी। उस पर खिलते, लटकते गुलाबी फूलों का आकर्षण ही था कि एक दिन मैं सच में पहुंच गई उस झाड़ी को देखने। अहा! कांटे भी सुंदर लगते थे उन खूबसूरत छोटे-छोटे गुलाबी फूलों के साए में। चुभने की परवाह न करते हुए मैंने हाथ बढ़ा लिया वो गुलाबी लड़ियाँ छूने को। किंतु फूलों के अलावा वहां कुछ और भी लटकता हुआ देखकर हाथ अपने आप ठिठक गए। हां, गुलाबी फूल और हरी पत्तियों के कांटेदार शाख पर एक लंबा लालटेन जैसा घोंसला भी लटक रहा था। यह बया का घोंसला था। बारीक और अद्भुत कौशल से निर्मित उसकी बुनावट मेरे मन में इस कलाकृति के वास्तुकार को देखने का कौतुहल पैदा करती थी। मैंने उसे ढूंढने को हर तरफ निगाह दौड़ाई। कोई चिड़िया तो उस वक्त मुझे वहां न दिखी मगर उसी तरह के पाँच-छह और घोंसले मुझे उस पेड़ पर लटकते हुए दिख गए। अपने घर के आँगन से कुछ छोटा दिखने वाला झाड़ीनुमा यह कांटेदार पेड़ मुझे उस वक्त बहुत बड़ा जान पड़ा क्योंकि उस पर तो पंछियों की एक पूरी बस्ती बसी हुई थी। मगर यदि मैं यहीं खड़ी रही तो चिड़िया घोंसले में आएंगी कैसे ? इसलिए उस वक्त मैं वहां से चली गई, लेकिन गुलाबी फूलों और अनूठे घोसलों के मकड़जाल में फंसी मैं हर रोज एक न एक बार पंहुच ही जाती थी वहां। अपने आंगन से उस प्लॉट तक की उस खूबसूरत गश्त के दौरान एक दिन मैंने देखा कि मुझसे पहले ही वहां कोई आदमी खड़ा होकर उस झाड़ीनुमा पेड़ पर कुल्हाड़ी चला रहा है। उसे रोकने के प्रयास में मैं भाग कर गयी और जरा जोर से डांटकर उस मजदूर आदमी को पूछने लगी कि क्यों काट रहे हो यह पेड़ ? सिटपिटाते हुए उसने कहा, घर बनेगा यहां पर ! जिनकी जमीन है उन्होंने कहा है प्लॉट साफ करने को। फिर कुछ समझाते हुए लहजे में कहता है , इ पेड़ थोड़े ही है इ तो झाड़ी रही। पर मैंने न समझने की जिद में थोड़ा सख्ती से कहा, नहीं ! अभी इस पर घोंसले लटकते हैं। इसलिए झाड़ी को हाथ भी मत लगाना। वह अब मुझसे नजर हटा कर झाड़ी को इस तरह देखता है जैसे उस पर लटके हुए घोंसले सोने-चांदी के बने हों। मैं अब रोज चिंतित निगाहों से झाड़ी पर नजर रखती और नजर रखते-रखते ही न जाने कब एक दिन वो झाड़ी नजरों से ओझल भी हो गई। हां घर बनने की शुरुआत अब ढंग से नजर आने लगी वहां। लेकिन ! उजड़ गया जिनका आशियाँ कहां गये होंगे वो ? इस बात का कांटा दिल में रह-रह कर चुभता था। उसी चुभन को दिल में दबाए हुए एक दिन जब मैं अपने आँगन के पास वाली क्यारी में टहल रही थी कि वहां खड़े एक चकोतरे के पेड़ का नुकीला काँटा मेरे गाल को चीरता हुआ सा गुजर गया। हाँ, जरा में आँख बची है,यही सोच कर मैंने माली को कहा कि कल इस पेड़ की ठीक से काँट-छांट कर देना। औजार लेकर जब अगले दिन वह पेड़ का मुआयना कर ही रहा था कि किधर से शुरुआत की जाए काँट-छाँट करने की ? तो मैं देख रही हूं कि एक चिड़िया भी उस पेड़ के चारों तरफ बड़ी तेजी से चक्कर काट रही है। वह छोटी सी काली सफेद डॉट वाली चिड़िया बहुत व्यग्र है , जैसे इसका कोई सामान इस पेड़ पर छूट जाने वाला हो। मैं पेड़ के ठीक नीचे खड़े होकर ऊपर देख कर उसके सामान को तलाश करने लगी। ओ हां ! सच में पत्तियों की चाहरदीवारी से ढका एक घोंसला था वहां। क्योंकि वह पेड़ अब सिर्फ पेड़ नहीं, घर था किसी का इसलिए मैंने माली को मना कर दिया उसकी काँट-छाँट के लिए। हां, कांटों से बचने के लिए हमें ही अब बगीचे में जाने का मोह त्यागना होगा। रहने दो चिड़िया और पेड़ को घोंसले के सानिध्य में। इस तरह सूखे घास फूस के तिनकों ने हरे पत्तियों की जान बचा ली। मैं सातवें आसमान में थी कि मेरे पेड़ पर अब एक घोंसला भी है । पर खुद मैं अब अपने आँगन तक ही सिमट कर रह गई। मैं वहीं से छुप-छुपकर चिड़िया को बार-बार देखती क्योंकि घोंसले के पास फटक कर उसका नन्हा दिल बार-बार भय से धड़काना उचित न था। इधर मैं तो उसे नजर बचाकर देखती थी पर उधर वह मुझ पर भरपूर नजर रखे हुई थी। क्योंकि जब मैं घर के पीछे वाली क्यारी की तरफ घूमने जाऊं , जहां लौकी और तुरई की विशालकाय बेलों पर बड़े-बड़े पीले और सफेद फूल लगे हुए थे, तो वो काली-सफेद पोल्का डॉट वाली नन्हीं चिड़िया भी मुझे वहीं नजर आती। कमाल है ! इसे कैसे पता चलता है कि मैं किस वक्त कहां हूं ? खैर चकोतरे के पेड़ को देखते हुए अनुमान लगाना कि अब इस पर टिके घोंसले में चिड़िया ने अंडे दे दिए होंगे, तो कभी पीछे की क्यारी पर लौकी और तुरई के फूलों को निहारना कि अब इन पर लौकी तुरई लगेंगी। इन सब में दिन बड़े सुहाने बीत रहे थे। पेड़, पौधे, हरियाली, चिड़िया, घोंसले यही सब मिलकर तो हमारे मन के पर्यावरण को दुरुस्त रखते हैं आखिर। पर्यावरण तो मस्त था लेकिन वातावरण में अब थोड़ा सा बदलाव आने लगा । मौसम जरा आगे खिसकने लगा। इधर घोंसले में होने वाली हलचल से तो जी प्रसन्न था कि वहां से अब चिड़िया के बच्चों की चीं-चीं चीं-चीं सुनाई देती थी। पर उधर पीछे की क्यारी से लौकी तुरई खा-खाकर जी ऊब गया था। अब वो स्वाद में भी कड़वी होने लगी थी। इसलिए मैंने माली को कहा कि कल ये दोनों बेलें तुम यहां से हटा देना। ठीक है कहकर अगले दिन उसने दोनों बेलें काटकर रख दी। बेल का पूरा साम्राज्य छत से गिरकर एक ही झटके में नीचे खेत पर आ गिरा। उसके साथ-साथ कई तोरियां और लौकियां भी जमीन पर आ गिरी। साथ ही गिरी एक और चीज भी। हाय राम ! एक चिड़िया का घोंसला भी था इस बेल पर और अब वह उसके बच्चों समेत जमीन पर आ गिरा। हे भगवान अनजाने में ही ये क्या पाप हो गया मुझसे। हमें कभी दिखा क्यों नहीं यह घोंसला ? मैं इस घोंसले की मालकिन को चकोतरे के पेड़ वाले घोंसले की ही मालकिन समझने की भूल कर रही थी। अब क्या हो ? मैं तो सच में ही डर के मारे रोने लगी थी। घोंसला जमीन पर गिरते ही चिड़िया के बच्चों के दाना पानी छिन जाने का डर जो था। याद आई वो दुपहरी जब एक घोंसले से अंडा उठा लेने पर माँ ने बहुत जोर से डाँटा था कि तुमने उसका अंडा छू लिया है, पता नहीं चिड़िया अब घोंसले में आएगी भी या नहीं। बरसों एक अपराधबोध सालता रहा कि अगर सच में चिड़िया नहीं आई होगी तो ?अब सामने गिरे घोंसले से चिचियाते चिड़िया के बच्चों का स्वर उसी अपराध की फिर से मुनादी करवा रहे हों जैसे। किंतु फिर बरसों से मन में बसे -बसाए इस भय को परे धकेल कर मैंने साहस जुटाया। तुरई की उस बेल को जो कटने से पहले रस्सियों के सहारे छत से नीचे लटक रही थी, उसे सहारा देकर दोबारा वैसे ही लटका दिया। अब घोंसले को बच्चों समेत उठाकर पत्तों और रस्सियों के बीच जहां वह पहले था, वहीं फिट कर दिया। बेल का तना बेशक कट चुका था, लेकिन मुझको मालूम था कि मुरझाई पत्तियों को पूरी तरह सूखकर तने का साथ छोड़ने में अभी पर्याप्त समय लगेगा और इतने समय में शायद चिड़िया के बच्चे भी घोंसला छोड़कर अपना आसमान पा जाऐं। घोंसले और चिड़िया के बच्चों को हमने छू लिया था। अब चिड़िया बच्चों से मिलने आएगी या नहीं इसी उधेड़बुन में रात बड़ी मुश्किल से गुजरी है। सुबह चार बजे ही मैंने छत पर दस्तक दे दी। अंधेरे में चिड़िया की आवाजाही का कोई निशान नहीं था। मगर पौ फटने के साथ ही अब दिल की चिंता भी हटने लगी जब देखा कि चिड़िया इधर-उधर से पता नहीं क्या-क्या बीन कर घोंसले में ले जा रही है। बच्चों को दाना खिलाती चिड़िया। चीं-चीं का शोर मचाते बच्चे भगाते इस डर को सदा के लिए मन से, कि इंसानों के घोंसला छूने के बाद भी चिड़िया अपने बच्चों को नहीं छोड़ती। पक्षियों के संरक्षण के लिए अच्छा था यह झूठा डर जो तब मां- बाप अपने बच्चों के दिल में बिठा दिया करते थे ।
अब ! सब कुछ अपने मन की हो जाने के बाद भी मन उदास है यह सोच कर कि काश कोई कहानी हमारे पूर्वजों ने पेड़ों के संरक्षण के लिए भी गढ़ी होती कि अगर इन पर कुल्हाड़ी छुआई तो तुम भी नहीं पनपोगे। सुखाईं इनकी जड़ें तो खुद भी चैन की सांस लेने को तरस जाओगे। आखिर घोंसले भी तो तभी बचेंगे ना जब पेड़ अस्तित्व में रहेंगे।
प्रतिभा की कलम से
