समवेत स्वर आया, कृष्ण जन्म की बधाई हो
हां, ऐसा ही कोई दिन रहा होगा ,डॉक्टर ने जब खुशखबरी सुनाई थी नौ महीने बाद तुम्हारे आने की। तीन महीने तो बड़े आराम से प्रफुल्लित हो बीत गये ..पर एक दिन अचानक तबियत बहुत खराब हो गयी , और फिर बच्चे और मेरी जान की खातिर डॉक्टर का फरमान- ‘अब आपको बेडरेस्ट करना है , कोई भारी काम नहीं करना ‘ .
एकदम से सारे काम बंद होना अटपटा सा लग रहा था पर सासू मां और इनका भी हुक्म था कि नौ महीने बाद जो चाहे कर लेना पर अभी कुछ नहीं करना .
अब मेरा काम ही क्या रहा ?
दो बार नाश्ता करना , दिन में हरी सब्जियों युक्त खूब पौष्टिक भोजन , दिन भर फल – दूध लेते रंहना ,किताब पढ़ना , संगीत सुनना ,
पर मेरे बिना भी सब अपना – अपना काम बहुत आराम से निभा रंहे थे , साथ में मेरा भी .
मैं बहुत बोरियत महसूस करती . शुरू – शुरू में मैंने दो स्वेटर भी बुनी अपने बड़े बेटे के लिए !! मगर फिर आंखे जवाब देने लगीं . उसे पढ़ाती तो अक्षर नाचते से प्रतीत होते , इसलिए अपनी रुचि की किताबें पढ़ना भी बंद हुआ .
करूं क्या !
फेसबुक की बीमारी तब मुझे न थी ,न मैं टी.वी. की शौकीन !
बैठे – बैठे मुझे याद आते वो दिन जब इनके ऑफिस जाने तक तो मैं फट- फट काम करती ,लेकिन इनके जाते ही कोई किताब ले के जरा सुस्ताने बैठी तो दिन उसी में बिता दिया, या कोई फूल मुरझाया हुआ ,टूटा हुआ दिख गया तो फिर उसकी सेवा चालू और अगर ये नहीं तो आलमारी में अपने सूट – साड़ियों की गिनती करना ,या फिर अपनी लिपस्टिक , बिंदी ,नेलपॉलिस , परफ्यूम की एक्सपाइरी डेट चेक करना ताकि नयी शॉपिंग ..!
और इस तरह इन फालतू कामों में पड़कर कई बार मैं बाल संवारना भी भूल जाती .
नहाने के बाद जब देर तक गीले बाल न सुलझाये जायें तो उनमें कैसी मोटी सी लटें पड़ जाती हैं ना !
ऑफिस से आकर जब मुझे ये इस हाल में देखते तो इनका पहला सवाल यही होता – काम वाली नहीं आयी आज ?
झूठ बोलने की आदत पनपी नहीं कभी ,इसलिए चाय बनाने का बहाना करके सामने से हट जाती मैं .
चाय लेकर आती तो ये कहते , अच्छा अब तैयार हो जाओ , कहीं घूमने चलते हैं ..खाना भी बाहर ही खा लेंगे .
.अहा !
ईश्वर तब कितने अनूकूल था मेरे ., और अब ???
बाहर जाना तो दूर , महींनों से छत तक भी न जा सकी थी .
वक्त गिन – गिन के बदला ले रहा था मुझसे.
जब वक्त नहीं होता था , तब अचानक कभी श्रृगांर करने की याद आ जाती तो झट से मांग भरकर , लिपिस्टिक लगा, आंखो में काजल लगा के घर में भी अच्छी सी साड़ी पहन लेना …
ये भी देखकर पहले खूब हंसते ,फिर कहते ..चल घुमा के लाता हूं .
इन्हीं दिनों की याद में सुबह – शाम बीत रही थी .
एक दिन शाम को बैठे – बैठे अपनी कलाइयों पर नजर पड़ी , जाने कब से नयी चूड़ियां नहीं पहनी थी .
उठकर श्रृंगारदान से लाल रंग की कांच की चूड़ियां निकाली .दो चूड़ियां दाहिने हाथ में डाली ही थी कि उनमें एक से टूट गई और टूटा हुआ एक कांच का टुकड़ा सीधे मेरी नस में ..
उफ्फ़ !
खून छलछला के जमीन पर !
पहले तो समझ न आया क्या करूं , फिर अपने ही हाथ से दांया हाथ कसकर दबा दिया .
इतने में मां जी आ गईं , खून देखा तो झट से अपने ही दुपट्टे से मेरा हाथ कस के बांध दिया .
फिर कुछ देर बाद नल पे ले गईं , हाथ धुलाया , पट्टी बांधी .
जितनी देर तक उन्होंने ये सब किया मैं सोचती रही कि आज पहली बार ऐसा हुआ है कि दर्द तो मुझे हुआ लेकिन इस पर आश्चर्य और दु:ख नहीं !!
वरना जरा सा सिरदर्द भी हो जाये अगर तो ईश्वर के साथ मैं अपने कर्मों का लेखा – जोखा ले के बैठ जाती थी .
‘हे ईश्वर , मैंने ऐसा क्या कर दिया , जो मेरे सिर में दर्द दे दिया’ .
और फिर भगवान को कोसते हुए मैं अपने कई छोटे – छोटे मनगढ़ंत पाप याद करने लगती .
और जब ये ऑफिस से आते तो मैं भागकर जाती कि देखो आज कितना सिर- दर्द हुआ है मुझे.
पर आज मैं शान्त रही , नहीं कहा मैंने कि हाथ इतना गहरा कट गया.
हां , सच में शारीरिक परेशानियां झेलते – झेलते मैं मानसिक तौर पर मजबूत हो रही थी. परेशानियों को अच्छा टाइमपास मिल गया था नौ महीने का ।एक खत्म न होती तो दूसरी शुरू होजाती .इसमें बस एक अच्छी बात ये रही कि जिन भी आत्मीय स्वजनों ने सुना कि मां जी की छोटी बहू की तबियत खराब हुई है ,वो सब मेरा हालचाल लेने आये …बार – बार आये .
उनकी बातों , संवेदनापूर्ण व्यवहार से जी लगा रहता और मन में नवीन आशा का संचार होता .
जबकि दुनिया सिर्फ मेरे कमरे से बरामदे के पास लगे झूले तक सिमट गयी थी , मैं बस इतना भर चल पाती थी
फिर इस तरह आया वो दिन जब डॉक्टर ने इन्हें कहा – congratulation Mr.Naithani ! बेटा हुआ है बेटा ?
डरते – डरते इन्होने मौसीजी को फोन किया जो भागवत में शामिल होने गईं थी ,ये सोचकर कि नवरात्र में डिलीवरी होनी है तो निश्चित रूप से इस बार उनकी दीदी के यहां दो पीढ़ियों में पहली कन्या का जन्म हो ही जायेगा . इधर से इन्होंने कहा – हैलो मौसी , बेटा हुआ है .
उधर से बहुत से लोगों का समवेत स्वर सुनाई पड़ रहा है ..कृष्ण जन्म की बधाई हो .
हां !
वासंतिक नवरात्र की अष्टमी थी ,गांव में भागवत कथा में कृष्ण जन्म संपन्न हुआ था .
‘वसुदेवं सुतं देवं ,कंस – चाणूर -मर्दनमं
देवकी -परमानन्दं ,कृष्णं वन्दे जगदगुरूं’ !
यकीनन देवकी मुक्त हुई कष्टों के कारागार से .
उस पल मैंने जाना कि कष्ट किसे कहते हैं , सुख की परिभाषा क्या है ?
अब मुझे समझ में आया कि ईश्वर को अपने अनूकूल रहने की खातिर ही मैं सत्कर्मों की ओर उन्मुख रहती किन्तु आज मुझे संवेदना प्राप्त हुई दूसरों के कष्ट को आत्मा से महसूस करने की भी.
गोद में लिया उस फरिश्ते को जिसने नौ महीने सब्र किया मुझे बदलने के खातिर !परमात्मा का वरदान मानकर मैंने उसी पल उसे नाम दिया – ‘वरद’ मतलब कि गणेश जी ।।
कान्हा ! तुम्हारे जन्मदिन पर मुझे अपने कान्हा के जन्म की ये कथा बार – बार याद आ जाती है।
प्रतिभा की कलम से
