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“पागल फ़क़ीरा”… क्षितिज पर दूर सूरज चमका, सुबह खड़ी है आने को..

“पागल फ़क़ीरा”
भावनगर, गुजरात
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क्षितिज पर दूर सूरज चमका, सुबह खड़ी है आने को,
धुंध हटेगी, धूप खिलेगी, फिर दिन नया है छाने को।

साहिल पर बैठे बैठे डरते रहने से क्या होगा दोस्त,
लहरों से लड़ना होगा उस पार समन्दर जाने को।

प्यार इश्क़ तो है पुरानी बातें, कैसे इनसे नज़्में सजे,
आज की क़लम वो दर्द लाई सोती रूह जगाने को।

दिन गुज़रा याद दिलाता है, भूली बिसरी बातें अब,
सुर नया हो, ताल नया हो, गाये नये अफ़साने को।

ख़ुद के हाथों की लक़ीरों को तू करले ख़ुद के बस में,
“फ़क़ीरा” तेरी रूठी तक़दीर कौन आये उसे मनाने को।

 

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