Wed. Jun 3rd, 2026

हरीश कण्डवाल मनखी की कहानी…. बंटवारा

बंटवारा

महेश स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया से सहायक महाप्रबंधक की नौकरी से सेवानिवृत्त हो गये हैं और उनकी पत्नी मनोरमा भी डिग्री कॉलेज से हिंदी प्रवक्ता से सेवानिवृत्त होकर देहरादून के बंसत विहार स्थित पॉश कॉलोनी मेंं निवास करते हैं। रतूड़ी जी के तीन बेटे और एक बेटी है। बेटी दूसरी नम्बर की है। सभी बच्चों को अच्छी परवरिश के साथ पाला और शिक्षा दीक्षा दिलवायी। बच्चे भी पढने में होशियार थे तो सबने आईआईटी से बीटेक/एमटेक किया और मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पैकेज पर जॉब करने लगे। बेटी ने भी एमसीए किया, वह भी बैंग्लौर में जॉब कर रही है। दोनो बड़े बेटे एक कनाडा और दूसरा फ्रांस में सेटल है। जबकि, छोटा बेटा चेन्नई में रहता है।

महेश ने सेवानिवृत्त होने के बाद सबसे छोटे बेटे की शादी की तो तब सारा परिवार इकठ्ठा हुआ था। आजकल वीडियो कॉलिंग से सबके चेहरे और मनोभाव देखकर दोनों पति-पत्नी खुश हो जाते हैं। अब महेश और मनोरमा दादा-दादी बन गये हैं, नाना नानी भी बन गये हैं, नाती-पोतो का प्यार व्हाटसअप स्टेटस पर मिल जाता है। बच्चे ग्रांड फादर डे और ग्रांड मदर डे का वीडियो शेयर कर देते हैं। मझला बेटा जो फ्रांस में रहता है उसके बच्चों को तो उन्होनें बस फोटो और वीडियो कॉलिंग में ही देखा। गोद में लेना का प्यार उनको नसीब नहीं हुआ। बच्चों की उन्नति और उनकी खुशी के आगे उनके नाती-पोतो का प्यार बौना साबित हो जाता। समय में बदलाव आता जाता है, अब महेश उम्र के पड़ाव में आने के कारण बीपी के मरीज और पत्नी मनोरमा भी शुगर की मरीज हो गयी हैं। दोनों बस अपने हिसाब से खाना बनाते हैं, गोलियां ही सहारा हैं। बच्चे फोन करके हाल-चाल पूछते रहते हैं। वहीं, से सलाह दे देते हैं। मॉ-बाप के जन्मदिन पर और शादी के सालगिरह पर वहीं से केक बारी-बारी आर्डर करवा देते हैं।

मनोरमा लाख मना करती कि बेटा मैं मीठा खाती नहीं और तुम्हारे पापा भी कितना खायें। आप लोग बस फोन कर देते हो यही बहुत बड़ा उपहार है हमारे लिए, बच्चों तुम खुश रहो.. सुखी रहो इससे बढकर क्या चाहिए उम्र का तकाजा है। महेश भी टाईम पास के लिए कभी अग्रेजी अखबार पढ लेते तो कभी समाचार देख लेते, बाकि सोशल मीडिया में कभी-कभी अपने विचार व्यक्त कर देते। अच्छा हो गया अब स्मार्ट फोन आ गया, जिसने दूरी कम कर दी है साथ में बुढापे का सहारा बना दिया है।

परिवार का एक व्हाटसअप ग्रुप बना हुआ है, जिसमें सभी अपने घूमने फिरने खाने-पीने की चीजे और फोटो शेयर करते रहते हैं। कभी-कभी चैटिंग भी हो जाती है। लेकिन, अक्सर ऐसा समय कम ही मिल पाता है। महानगरों और विदेशों में रहने व कार्यशैली अलग होने के कारण सबको एक समय मिल पाना भी संभव नहीं हो पाता है। देहरादून में मनोरमा के भतीजे की शादी होनी तय थी सबने शादी में जाने का कार्यक्रम बनाया। शादी की तिथि के हिसाब से अपना-अपना एयर टिकट बुक कर दिया। महेश और मनोरमा बच्चों के इस फैसले से बहुत खुश थे, लगभग 4 साल बाद सारा परिवार एकत्रित जो हो रहा था। मनोरमा ने सबकी पंसद का खाना बनाने और उनके लिए स्वेटर बुनना पंसद कर दिया था। नाती-पोतियों को ढेर सारा प्यार देने और उनके साथ तुतलाने की इच्छा पूरी हो रही थी।

ईधर महेश ने भी सोच लिया कि अब उम्र ढलते सूरज की तरह हो रही है न जाने कब सूर्य अस्त हो जाय, इसलिए देहरादून की संपत्ति का बंटवारा अपने सामने कर और वसीयत बच्चों के सामने लिखवा दूं। मनोरमा को भी अपने दिल की बात बता दी। कहा कि अब हमें अपनी उम्र को देखते हुए बच्चों को उनकी जिम्मेदारी और हिस्सेदारी सौंप देनी चाहिए ताकि हमारे जाने के बाद कहीं विवाद न हो जाय। स्टेट बैंक में रहे तो उनके सामने प्रॉपर्टी को लेकर कई मामले ऐसे सामने आये कि मॉ-बाप के स्वर्गवास होने के बाद भाईयों में सम्पत्ति बॅटवारे के लिए आपसी झगड़े और मनमुटाव हो गया, अच्छा खासा परिवार बिखर गये। अपने अनुभवों और बीती घटनाओं से सबक लेकर महेश ने इस बार सम्पत्ति का बंटवारा करना उचित समझा।

वक्त कब निकल जाता है यह तो पता ही नहीं चलता। शादी की तिथि नजदीक आ गयी, मनोरमा ने खरीददारी करनी शुरू कर दी, क्योंकि बच्चों की पंसद का राजमा चावल, खीर, उनके लिए मूंग का हलवा ड्राई फ्रूट आदि लेकर आ गयी। सभी बच्चे घर पर आ गये। आज बच्चों की चहचहाट और सबकी खिलखिलाहट से घर गूॅज रहा था। आज लग रहा था कि इंसानों से ही घर होता है, वरना चारदीवारी तो जेल में भी होती है। रात को सब खाकर पीकर जल्दी सो गये। सुबह सब अपने आराम से उठे उसके मनोरमा ने आलू के परांठे बनाये। लेकिन, बच्चों को नाश्ते में पाश्ता और ब्रेड चाहिए था, उनके लिए वही मॅगवाया गया। उसके बाद सब लोग शादी में शामिल होने के लिए निकल गये। दो दिन शादी में निकल गये। महेश अपनी दिल की बात कहना चाहता था। लेकिन, अनुकूल समय नहीं मिल पा रहा था।

आखिरकार शाम को सब बच्चे ड्रांईग रूम में एकत्रित हो गये कुछ देर तक बात की फिर सब फोन में व्यस्त हो गये। बड़ी बहु का फोन आ गया, मझले बेटे का भी कॉल आ गया वह उठकर बात करने बाहर चला गया, बच्चे वीडियो गेम खेलने में मस्त हैं। छोटा बेटा और बहु भी व्हाटसअप पर व्यस्त हैं, बड़ा बेटा कभी दो-चार बातों में हॉ में हॉ मिला देता। ईधर महेश सोच रहा है कि सब एक बार फिर साथ में हो जाय तो इनके सामने अपनी बात रखूॅ और बंटवारा कर दू।

लेकिन, आजकल के व्यस्ततम समय में समय का बड़ा अभाव है। महेश की मन की बात मन में ही रह गयी। मनोरमा ने कई बार बात करने की कोशिश भी की। लेकिन, महेश ने रूकने का ईशारा कर दिया, वह सबके सामने यह बात करना चाहते थे। लेकिन, ऐसा वक्त ही नहीं आया कि सब सामने 15 मिनट के लिए बैठ जायं। बैठे भी तो सब फोन में व्यस्त। महेश को लगा कि इससे अच्छा तो यह दूर रहकर ग्रुप वीडियो कॉलिंग करके एक तो हो जाते हैं। अगले दिन सबकी वापिसी की फ्लाईट थी तो उसके बाद सब सोने चले गये। सुबह-सुबह उठकर सब जाने की तैयारी में व्यस्त हो गये और महेश और मनोरमा भी उनको भेजने की तैयारी मे जुट गये। सब लोग गले मिलकर अपने अपने वतन के लिए निकल पड़े।

महेश और मनोरमा फिर दोबारा अकेले हो गये। कल तक घर मे बच्चों के खेलने की धमक और हल्ला था आज फिर वही शांति। मनोरमा ने कहा कि जब मैं कह रही थी कि आप अपनी बात कहो। लेकिन, न तुमने कही और न ही मुझे कहने दिया। अब पता नहीं यह मौका कब आयेगा। महेश ने कहा कि मैने भी इसका रास्ता खोज लिया है, मैं भी सम्पत्ति का बंटवारा अपने हिसाब से करके फोन पर ही वसीयत बनाकर बच्चों को व्हाटसअप पर भेज देगे। जब फोन पर ही दुनिया है तो फिर वसीयतनामा भी फोन पर ही लिखकर भेज दिया जायेगा।

अगले दिन महेश ने फोन पर ही सम्पत्ति का बंटवारा कर दिया, तब बड़े बेटे और मझले बेटे ने कहा पापा उस दिन जब हम सब साथ थे तब तुमने बंटवारा क्यों नहीं किया, इस पर मनोरमा ने कहा बेटा तुम शरीर से तो साथ थे। लेकिन, तुम्हारा मन और मस्तिष्क तो फोन और अपने काम में लगा था। हम बात भी करते तो पुतलों से करते, जब घर आकर भी सब लोग फोन पर ही व्यस्त थे, हम लोग तुमसे बच्चों से बहुत सारी बातें करना था, दुलार करना था। लेकिन, बस बातें सोची हुई मन में ही रह गयी। अब आप लोग खुद इस हिसाब से बंटवारा कर लेना। महेश ने कहा बेटा अब परिवार कहने को रह गये हैं घर तो अब घर रह ही नहीं गया बल्कि गौशाला बन गया है। जैसे पशु खुंटे पर रहकर एक जगह पर बॅधे रहते हैं, वैसे ही आजकल सब फोन पर बॅधे हुए मौन और स्वंय मेंं मुस्कराते रहते हैं। जब समय लगे तो इस वसीयत को पढकर मुझे व्हाटसअप पर ही जबाब देना। व्हाटसअप ग्रुप वीडियो कॉलिंग और पारिवारिक ग्रुप में कुछ देर के लिए सन्नाटा पसरा हुआ था, सभी बहुएं और बेटे अपने किये हुए पर पछता रहे थे।

©®@हरीश कण्डवाल मनखी की कलम से।

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