सुलोचना परमार ‘उत्तरांचली’ की एक रचना… सबसे प्यारा सबसे न्यारा है यहाँ मेरा वतन
सुलोचना परमार उत्तरांचली
देहरादून, उत्तराखंड

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मेरा वतन
सबसे प्यारा सबसे न्यारा
है यहाँ मेरा वतन
जान भी दे दें इसी पर
सर पे बांधा है कफ़न ।
अति वेग से बहती है नदियां
पर्वतों की ओट से ।
बिलबिला जाती हैं कभी वो
पत्थरों की चोट से ।
मुस्कान होंठों पर लिए
बहने का करती वो जतन ।
ऐसा है मेरा वतन
हिमालय जिसके सर का ताज
और सागर पांव पखारे हैं।
भिन्न जाति ,धर्मों के यहाँ पर
वतन के सब रखवारे हैं।
हरी नाम लेकर बहती है
मधुर, सुगन्धित यहाँ पवन ।
ऐसा है मेरा वतन
सीमा की रक्षा में सैनिक
खड़े हैं जान हथेली लिए ।
वीरों की धरती है ये तो
डरें यहाँ हम किसलिए ।
जिस धरती के राणा, शिवा
लक्ष्मी, दुर्गा रहे रतन ।
ऐसा है मेरा वतन
मंदिरों के कीर्तन, मस्जिदों की अजान से
वाहे गुरु की वाणी से
महके सदा मेरा वतन
