डॉ अलका अरोड़ा की एक रचना.. लहजा शिकायत का अब रहने भी दो
डॉ अलका अरोड़ा
प्रोफेसर, देहरादून
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एक गुजारिश
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लहजा शिकायत का अब रहने भी दो
सिलसिला तौहमत का भी छोड़ो सनम
बाते दिलों की मुहब्बत की शुरू तो करो
ये रूह तेरे हवाले ना कर दूँ तो कहना।
हवा ने रंग बदला बदली खिजा भी दिखती
कली से दूर भँवरा गुलशन में नमी दिखती
मुस्कुरा कर क्यूं बढ़ाते हो मुश्किलें मेरी
चाँदनी हमेशा चाँद के पहलू में भली दिखती।
आवाज लगाते हो तो रुक भी जाओ हमदम
दो कदम ही सही साथ निभाओ हमदम
हाथ पकड़ा है तो ले चलो आसमाँ तक
जंमी पे अब पहली सी मुहब्बत नहीं दिखती।
रंग बसन्ती ही लुभाता है आंखों को हरदम
दिल की धड़कने काबू में अब नहीं दिखती
हमपे मरने की जरूरत अब भी उतनी ही है
तेरे गीतों पे थिरकती थी पायल मेरी जितनी।
वक्त की चादर में ना दबने दो अहसासों को
हंसनें की अदाओं ना मुस्कुराने के वादों को
मत लूटो इस दिल को दीवानों की तरह
सजने दो इस महफिल को दुल्हिन की तरह।
