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डॉ अलका अरोड़ा की एक कविता… जहां मैं उड़ना चाहती थी

डॉ अलका अरोडा
प्रोफेसर, देहरादून
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सपने जो पूरे करने होंगे
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वो मेरा बचपन
जहाँ मैं उड़ना चाहती थी
खुशी मुस्कुराहट लिए संग
आसमान छूना चाहती थी
बेलगाम परों को खोल कर
कामयाबी के शिखर चूमना चाहती थी
पर ये हो ना सका
मैं कर भी ना सकी

उन्माद भरे
बे-परवाह रास्ते
ऊँचे सपने खिलता यौवन
अन्जान डगर नया हम सफर
देश के समाज के दायरों से दूर
सोचा जीऊँगी थोड़ा जीवन
कस्तूरबा कमला रजिया बनकर
देश की सजग प्रहरी बनूं
पायल के बंधनों से आजाद
होकर अपनी पहचान बुंनू
पर ये हो ना सका
मैं कर भी ना सकी

हुई प्रौढ़ा
दिखा उजाला
आत्मविश्वास स्वाभिमान से हुआ परिचय
खुद के लिए जी ना पाई
सोचा करूं निरीह बेसहारा निर्बल की सेवा
अपना संबल देकर संवारूँ
मातृभूमि का कल आने वाला
नई पीढ़ी में ऊर्जा भरकर
अंधियारे पथ पर उन्हें
चराग जलाकर दिशा दिखाऊँ
पर ये हो ना सका
मैं कर भी ना सकी

ऐसे क्षण
करते मन को कमजोर
रह जाती है टीस हमेशा
दर्द दिया करते हर पल
जानती हूँ
बहुत मजबूत हो जाते हैं वे लोग
जिनके सपने पूरे नहीं होते
कीमत पहचान जाते वक्त की
बीते पल कभी वापस नहीं मिलते
जिन्दगी जीनी थी, जी नहीं
बर्फ की माँनिद कभी जमी ,कभी पिघल गई
टीस चुभन दर्द सब एक साथ मिलाकर
जीने का नया पथ प्रगाढ़ करें हम
जो जिया नहीं कभी दिल से
उस पल का आग़ाज करें हम
मानती हूं
ये हो कर ही रहेगा
जानती हूँ
मैं अवश्य करूंगी
मैं करके ही रहूँगी
बढ़ चली एक मजबूत डगर
हूँ बिल्कुल निर्भय निडर
ना पाने की चाह ना खोने का डर
शायद यही पल है
सबसे बेहतर
सबसे बेहतर
सबसे बेहतर।
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सर्वाधिकार सुरक्षित।
प्रकाशित…..19/12/2020
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