डॉ अलका अरोड़ा की एक रचना… मेरे बदले मिजाज को समझा सिर्फ मौसम ने
डॉ अलका अरोड़ा
प्रोफेसर, देहरादून
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मेरी और मौसम की साझेदारी
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मेरे बदले मिजाज को समझा सिर्फ मौसम ने
आंसू बरसे आंख से पत्थर हृदय नरम हुआ
मैं नरम मिजाज हुई तो यह भी बदल गया
बादल बनकर मेघों सा ये धरा पे बरस गया।
खुद को जमाने की नजरों में उलझा देखा
पत्थर में मोम सा खुद को पिघलते देखा
देख मुझे ऐसा मौसम भी बदल गया
भरी गरमी में शीतल बन संवर गया।
सर्द हवा ने खुशी को आच्छादित कर डाला
नर्म बिस्तर को भी कठोर कर डाला
रिश्तो की गर्माहट पल-पल ही काफूर हुई
मौसम की आह भी दर्द बनकर जम गई।
जीवन पड़ाव पर ऋतु पतझड़ की जब आई
फैली उदासी हर तरफ बरसी घोर पुरवाई
बंधन दिलों से प्रतिक्षण मीत मिलन के टूट रहे
मौसम के पीले पात भी देखो हर पल झड़ रहे।
बसंत ने फैलाया अपना इन्द्रधनुषी साम्राज्य
मैं खिली मन खिला और बहारें खिल आई
मन मयूर सा नाचे मेरा गगन छूने को उड़े
मौसम ने भी देखो हर दिशा में फूल खिलाए।
एक मौसम मेरे भीतर भी खिलता रहा
प्यार से सारे जग को जीतने निकला
खुशियां बिखेरी मैंने हर मजहब हर डाल पर
मौसम ने भी देखो बदला अपना मिजाज तब।
मौसम देखो आज करवट लेकर बदल गया
मेरे भीतर खिलने वाली हर रंगत समझ गया
मेरा मिजाज और मौसम दोनों संग चलते
सभी ऋतु का आनंद दोनों मिलकर सींचते।।
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सर्वाधिकार सुरक्षित।
प्रकाशित…..14/12/2020
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