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जसवीर सिंह हलधर की एक गज़ल…घरौंदे का सँभलना अब जरूरी हो गया है

जसवीर सिंह हलधर
देहरादून,उत्तराखंड
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ग़ज़ल (हिंदी)
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घरौंदे का सँभलना अब जरूरी हो गया है।
दरिंदों को निगलना अब जरूरी हो गया है।

सभी अहसास जम पत्थर हुए हैं चोट खाकर,
शिलाओं का पिघलना अब जरूरी हो गया है।

हमारी खामियां भारी पड़ीं हैं आज हम पर,
सपोलों को कुचलना अब जरूरी हो गया है।

अहिंसा ने हमेशा देश को धोखा दिया है,
हमें पथ को बदलना अब जरूरी हो गया है।

बिना संगीन के रक्षित नही होती अहिंसा,
हकीकत को समझना अब जरूरी हो गया है।

सभी अब इस बुरे हालात से उकता चुके हैं,
कमीनों को मसलना अब जरूरी हो गया है।

तरक्की का हमें क्या फायदा जानें गँवाकर,
बुलंदी से उतरना अब जरूरी हो गया है।

शहीदों के जनाजे आज सब कुछ कह रहे हैं,
लहू “हलधर” उबलना अब जरूरी हो गया है।

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