Sat. Jul 18th, 2026

दल-बदल की राजनीति पर कवि जीके पिपिल की चुटकी … आज वही हुआ है अब घर के रहे ना घाट के रहे

जीके पिपिल
देहरादून, उत्तराखंड

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जब बुलंदी पर थे तो चर्चे उनके थाट बाट के रहे
त्यौरी उनकी चढ़ी रहीं बल भी टेढ़े ललाट के रहे
जहाँ भी पहुँचे वहीं काटने भोंकने को दौड़ते रहे
आज वही हुआ है अब घर के रहे ना घाट के रहे

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