मेरा नाम अपनी किताबों पे लिखकर.. वो दाँतों से अंगुली दबाती तो होगी..
“कहीं एक मासूम नाजुक सी लड़की
बहुत खूबसूरत मगर सांवली सी
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मेरा नाम अपनी किताबों पे लिखकर
वो दाँतों से अंगुली दबाती तो होगी ।
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वो बेसाख़्ता धीमे-धीमे लबों से
मेरी धुन में कुछ गुनगुनाती तो होगी
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कहीं के कहीं पाँव पड़ते तो होंगे
दुपट्टा जमीं पर लटकता तो होगा।”
अहा ! अद्भुद लगा। वास्तव में कहीं के कहीं पाँव पड़ने लगे जब पहली बार सुना था ये गाना। जाना कि साँवले रंग पर भी गाने लिखे जाते हैं और रफ़ी साहब इसे गाते हैं।
ये गीत अगर मुकेश, किशोर कुमार या किसी अन्य गायकों की आवाज में होता तो कह नहीं सकती कि कैसा लगता ! लेकिन रफ़ी साहब की नाजुक, कोमल, मखमली, दिलकश आवाज का असर था कि दिल की साँवली उदासी सदा के लिए मर जाती रही। वहम है या सच ! लेकिन तब से जब भी ये गीत सुना, लगा जैसे रफ़ी साहब मेरे लिए ही गा रहे हों। सही मायनों में ये गीत और मोहम्मद रफी की जादुई आवाज ही हम सांवली रंगत वाली लड़कियों का पहला प्यार है, जो कानों में पड़ जाए तो मन चंपा-चंपा सा खिल जाए हर बार।
आज हम हैं, उनके गाये हजारों गीत हमारे पास हैं। मगर रफ़ी साहब नहीं हैं। 31 जुलाई 1980 में वह इस जहां को अलविदा कह गए। उनकी अंतिम यात्रा की दूरदर्शन पर एक वीडियो रिकॉर्डिंग देखी थी मैंने। मूसलाधार बारिश में भी हजारों लोगों की भीड़ थी। इंडस्ट्री में सबके साथ उनके विनम्र और मधुर स्वभाव का ही असर रहा होगा कि भयंकर बारिश के बावजूद भी अनगिनत फिल्मी सितारे आपकी अंतिम विदाई में शरीक हुए थे। शुक्र है कि रेडियो कभी खाली नहीं रहता हिंदी फिल्मों में आपके गाये बेशुमार अनमोल नग्मों से। लगता है जैसे रूह आवाज में भरकर रोज लौट आते हों रफ़ी साहब हमारे लिए।
प्रतिभा की कलम से।
