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बात बचपन की…ओस की बूंद और नाक की लौंग

जो पल, जो चीज, जो स्थिति मुझे रुच जाए, उसमें कुछ वक्त के लिए ठहरना मेरा शगल है। ऐसा ही आज मन ठहर गया इन नन्ही-नन्ही ओस की बूंदों पर, जब सुबह की सैर पर निकली। ओस की बूंदों को देखना कोई नई बात तो नहीं, मगर आज जब छोटी सी बच्ची बन मन फिर गेहूं के खेत में दौड़ने लगा तो नयी सी लगीं। सर्दी के मौसम में ही जब मैं पाँच या सात बरस की रही होंगी तो उस बरस किसी बसंत पर्व पर माँ हमें ले गई एक दादी के घर। नाक छिदवाने। माँ ने कहा कि तब मैं तेरे लिए एक सुंदर सी लौंग यानी नाक की कील खरीद लूंगी। मगर माँ ने यह नहीं बताया कि उसे पहनने के लिए नाक छेदी किस तरह जाएगी। वो जिन्हें ! हम दादी कहकर बुला रहे थे, उम्र में माँ से भी कम मालूम होती थी। उन्होंने मेरे साथ-साथ कुछ और लड़कियों को भी बिठाया और नागफनी के कांटे से नाक छेदनी शुरू कर दी। आह ! दर्द तीक्ष्ण था। लेकिन आंसू निकलने से पहले ही एक जरा सा गुड़ का टुकड़ा उन्होंने झट हमारे मुंह में धर दिया। फिर जुबाँ पर न जैसे, मगर नाक पर तो दर्द रहा ही हर पल। सुबह मुंह धुलाने की जिम्मेदारी माँ ने ले ली। धीरे से मुँह धुलाया, पोंछा इस तरह कि नाक ना दुखे। मगर वह कोई एक दिन में दूर हो जाने वाला दुख ना था। सुबह, हर सुबह गेहूं की बालियों से ओस इकट्ठा कर नाक में छिदी हुई जगह के आसपास टपका देते। उस दर्द या झंझट को बर्दाश्त करना ही था कि माँ ने कान की लौंग का लालच जो दिया था। लाल नग वाली लौंग मुझे दाड़िम के लाल दाने सी लगती और सफेद नग वाली ओस की बूंद सी लगती। इस तरह ओस वाला घरेलू मरहम लगाते-लगाते जब नाक से दर्द एकदम जाता रहा तो उसमें काँच के सफेद नग वाली लौंग पहनकर लगा, जैसे असली ओस हमेशा के लिए जमा ली वहां पर। ये तब का रिश्ता था ओस से, जब पढ़ते लिखते ना थे। जब पढ़ने लिखने के दिन आए तो पढ़ा कि शिवानी जी की कहानियों में उनके बचपन का प्रिय शहर रामपुर के राजा साहब के रसोई में पकने वाला गोश्त का स्वाद कितना स्वादिष्ट और अलग होता था। क्योंकि खानसामा रात भर गोश्त को ओस में भीगने छोड़ देता था और फिर अपने प्रिय लेखक ध्रुव गुप्त सर के लेख में कहीं यह भी पढ़ा कि शरद पूर्णिमा की रात को कदम्ब के पेड़ के नीचे खीर रख दी जाए तो रातभर ओस के रूप में उसपर अमृतवर्षा होती है। प्रात: इस खीर को खाकर शरीर अनेक रोगों से मुक्त होता है। बलवान बनता है। वास्तव में इन बातों पर ओस का कोई फायदा था या नहीं, यह जानने की जरूरत कभी महसूस हुई नहीं। क्योंकि मेरी तो कोई बेटी है नहीं जो जब पाँच बरस की होती तो मैं भी बसंत पंचमी पर उसकी नाक छिदाती। अपनी माँ से पूछती कि -माँ क्या सच में ओस डालने से नाक के दर्द और संक्रमण में कोई राहत मिलेगी या अगर मैं मांसाहारी होती तो माँस को ओस में लटका कर रखती क्योंकि रामपुर का शाही बावर्ची रखता था।और शरद पूर्णिमा की रात अगर मैं खीर को ओस में रख भी दूं तो कदम्ब का पेड़ कहां से लाऊं? मेरे घर के आगे तो आंवले का पेड़ है। लेकिन कुछ बातें न समझी जाए तो ही अच्छी लगती हैं। जैसे पहेलियां, समझ में आने पर वह अपना अबूझ सौंदर्य खो देती हैं। मगर तमाम उम्र ओस को देखते-देखते एक बात अपने आप समझ में आ गई है कि –
‘कहो ओस चाहे शबनम
है ये दर्द की बूंद
जख़्म पर टपकी
जैसे,कोई मरहम’ !
प्रतिभा की कलम से

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