Sat. Nov 7th, 2026

बेसहारा जीवित पितरों के लिए क्यों नहीं हैं अन्न-पिंड, ठौर-ठिकाना… अपनापन???

गोवा के सेंट जेवियर चर्च में एक आंटी दिखी थीं। सैकड़ों सैलानियों के बीच में ‘अंगम् गलितम् पलितम् मुंडम्’ वाला ये इकलौता स्थानीय दृश्य था।
माथे पर एक बड़ा सा गूमड़, छड़ी सदृश पैर, पपड़ाए होंठ, मिचीं आँखे, दीन-हीन कृश काया ! हाथ फैलाकर किसी से कुछ माँगने का चलन भी गोवा में कहीं नजर आता नहीं। फिर ये इतनी वृद्ध महिला यहां क्या कर रही हैं?
जिस तरह तने के वलय गिनकर पेड़ की उम्र गिनी जाती है, उसी तरह मैं भी देह पर पड़ी झुर्रियां गिन-गिनकर उनकी उम्र जानना चाहती थी। किंतु यह तो अनगिनत थीं…तो क्या हो जो कुछ कर सकूं मैं इनके लिए? मन हुआ कि अपनी देह का गर्म रक्त उनके बेजान शरीर में दौड़ा दूं मैं.. इसलिए आगे बढ़कर गले लगा लिया मैंने उन्हें। बूढ़ी हड्डियों में एक अजनबी, अनजान लड़की से मिलते अपनेपन के रोमांच से उत्पन्न थरथराहट! और उनकी खुशी को महसूस कर झर-झर झरते मेरी आँख के आंसू..कुछ था, जो मिल रहा था ।
हाँ, दिल !
वास्तव में यह कोई और नहीं, मेरा आत्म-प्रतिबिंब था। सोचती हूं कि तमाम उम्र अपने घर-परिवार, बच्चों के साथ रहते हुए बुढ़ापे में अकेले रह जाने वाले लोग किस तरह अपने युवा समय को चुप और उदास होकर याद करते हुए जब और अधिक वृद्ध होते चले जाते हैं, तो हो सकता है मेरे साथ भी ऐसा ही हो। तब मौके-बे मौके इन बेवक्त की तस्वीरों में अपनी मुस्कुराहट और आत्मीयता से रंग भरने की कोशिशों को याद कर उस झुर्रीदार वक्त में मैं अपने सूखे होठों पर इसी तरह ताजगी लौटा लिया करूंगी। उनका सिर सहला, हाथों को बहुत देर अपने हाथों में ले, कुछ बतियाकर उनकी जगह पर उन्हें वैसे ही हैरान खड़ी छोड़ अपने बच्चों के संग आगे बढ़ती मैं ढूंढ़ रही हूं खुद को… हां, शायद वहीं छूट गई हूं मैं। गोवा वाली वृद्ध अम्मा के आलिंगन में।
जनवरी 2020 गोवा डायरी का एक पन्ना आज पितृपक्ष पर याद आया जब घर-घर उठती खीर, पूड़ी की खुशबू मन को गहरे पश्चाताप से भी भर देती है कि इन बेसहारा जीवित पितरों के लिए क्यों नहीं हैं हमारे पास अन्न-पिंड, ठौर-ठिकाना और अपनापन।


प्रतिभा की कलम से

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *