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नहीं बदली पूस की लंबी और ठंडी रातें

‘धूप के कतरे’

सर्दी का मौसम अच्छा लगता है मुझे कई कारणों से। इसमें फूल खिलते हैं बेशुमार ! फूलों के साथ- साथ धूप भी खिलती है। जो जलाती नहीं,खिलाती है तन-मन को। दिन छोटे हो जाते हैं मगर अलसाने को पल हैं बेहिसाब। धूप बिखरी है घर-आँगन के ओने‌- कोने में ! यहां तक कि बिस्तर में भी! कहीं भी बैठकर धूप सेंक लो। आँगन से जी भर गया हो तो चलो आज छत पर बैठें। छत से अड़ोस-पड़ोस की हर छत का नजारा दिखता है‍‍। सबपे लोग धूप सेंकते हुए। छत से एक झोपड़ी भी नजर आ रही है। उसमें कोई पक्की छत नहीं है। जिसमें बैठकर कोई धूप सेंक सके। मगर सूरज ने बेइमानी न की। छत पर न सही, झोपड़ी के अंदर ही धूप पसार दी । मगर लोग गायब हैं झोपड़ी केजाने कहाँ ठंड में , छाँव में काम कर रहे होंगे। मलाल होता है इनके लिये-कि धूप है इनकी झोपड़ी में भी ! मगर सेंकने वालो के पास वक़्त नहीं।
सर्द मौसम दर्द भी दे जाता है। जिनसे रिश्ता हो कोई उनके लिये दु:खी होना लाज़िमी है। मेरा आशियाना बनाने में पसीना बहाया था इन झोपड़ी वालों ने, तो कैसे न मैं उनकी झोपड़ी की सुध लिये बिन रह जाती ? एक बिजली के तार से उजाले का कनेक्शन देकर रिश्ता बाँध लिया था उनसे। अंधेरा तो दूर कर दिय बल्ब ने, मगर ठंड ? इसलिए सर्द मौसम की धूप में हर रोज की बिठावन में अक्सर सोचती चलती हूं कि ‘धूप के कतरे’ जमा कर लूं इन मजदूर झोपड़ी वालों के लिये, जिन्हें ये ओढ़ सकें, बिछा सकें।
आह!
हो न सके जो पूरे कभी, वो गरीबों के लिए देखे हुए आधे -अधूरे ख़्वाब मेरे।
हकीकत में नियति यही कि मन झुलसता है इन्हें गर्मियों की लू में जलते हुए जानकर और काँपता है ठंड में ठिठुरते हुए देखकर। गरीबी में जीने, मरने वालों का का हिसाब कहां दुनिया में किसी के पास हुआ ? हां, मगर तब भी गरीबी ने जिसे ‘अमीर’ कर दिया। उनमें से एक हुए हैं कथा सम्राट “प्रेमचंद”। उनकी कहानियाँ, उपन्यास कालजयी हैं। क्योंकि समय भले ही एक सदी से ऊपर हो गया हो, मगर पात्र अब भी जिंदगी जी रहे हैं। कथानक भले ही बदल गये हों मगर गरीबी ‘जस की तस’। झबरा अब हल्कू के साथ नहीं सोता क्योंकिं उसे दुकानों में सजे-सजाये अत्याधुनिक घर मिल गये हैं और पहनने को फर वाले वस्त्र भी। हल्कू ने खेती छोड़ दी है। क्योंकि जमीन बची ही नहीं। अपने ही खेतों में उगने वाले रईसों के मॉल में मजदूरी करने लगा है। सहना की जमींदारी अब बदल कर हो गयी है कालाबाजारी, जमाखोरी। बदला है और भी बहुत कुछ। मगर जो न बदली और शायद न बदलेंगी कभी। वो हैं ‘पूस की लम्बी और ठंडी रातें‘। अनगिनत हल्कू गरीबी की ओस तले झबरा की मौत मरने को मजबूर जिसमें।

प्रतिभा की कलम से…

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