Wed. Jun 3rd, 2026

कवि हरीश कण्डवाल ‘मनखी’… तुम मुझे महसूस होती हो मॉ..

देहरादून, उत्तराखंड


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अब जब भी गॉव जाता हूॅं
गाड़ी से नीचे उतरते ही
पानी की बोतल हाथ में लिए
तुम मुझे महसूस होती हो मॉ।

किसी को रास्ते में, गाय चुगाते देख
उनमें तुम्हारी अन्वार, झलकती है मॉ।
खेतों में पकी फसल काटते हुये देख
उनमें तुम्हारी सूरत सी दिखती है मॉ।

घर के ऑंगन में पहॅुचते ही देहली में
खड़े होकर मुस्कराते हुए दिखती हो मॉ
चारपाई में बैठते ही, सामने तस्वीर में
कुछ बोलने का अहसास सा होता है मॉ।

घर के ऑंगन में चावल फटकने हुए
तुम्हारी चुड़ियों की खनक सुनायी देती है
खाना खाते वक्त, रोटी लिये हुए हाथ में
दो रोटी और खाले, यह सुनाई देता है मॉ।

रात को सोते समय, सिरहाने में खड़ी हो
हाल चाल पूछकर, चितां व्यक्त करती हो
सब ठीक होगा, यह विश्वास दिलाती हो
थक है अब सो जा, ऐसा सुनाई देता है मॉ।

बैग में सामान रखते वक्त तुम दिखती हो पास
ये भी ले जा, वो भी ले जा, यह है तेरे लिए खास
सिर में जैसे हाथ रख दिया ऐसा होता अहसास
बस ऐसा लगता है, लेकिन तुम नहीं हो मेरे पास।

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