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आदमी का आजकल किरदार बौना हो गया है…

जसवीर सिंह हलधर
कवि/शाइर/गीतकार
देहरादून, उत्तराखंड
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मुक्तिका -( ग़ज़ल)
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आदमी का आजकल किरदार बौना हो गया है।
जिंदगी का फलसफा ही वैर बोना हो गया है।।

ढो रहा है आदमी कांधे सगे संबंध अब तो
मरघटों तक लाश लाना बोझ ढोना हो गया है।

जो कभी सरदार थे सालिम हमारे गांव भर के
अब बुढ़ापे में ठिकाना एक कोना हो गया है।

पक्ष औ प्रतिपक्ष में अब खास अंतर ही नहीं है
भ्रष्टता के दाग तो तर्कों से धोना हो गया है।

देख लो दंगों में जब से घर जले हैं आदमी के
मंदिरों औ मस्जिदों का मुँह सलोना हो गया है।

हिंदुओं की बस्तियां या मुस्लिमों के घर जले हो
मज़हबी सौदागरों का सर घिनोंना हो गया है।

औरतों के जिस्म पर तो कीमती पोशाक फबते
अंग प्रदर्शन न जाने क्यों खिलौना हो गया है।

पैंतरे बदले रिवाजों ने यहां पर इस तरह कुछ
बात शादी की चली तो साथ गौना हो गया है।

अब कहाँ लैला कहाँ मजनू कहानी खोजते हो
आज”हलधर” प्यार तो बस साथ सोना हो गया है।

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