Sun. Apr 19th, 2026

डॉ अलका अरोड़ा की एक रचना, यादें यूं भी पुरानी चली आई

डाॅ अलका अरोड़ा
प्रोफेसर, देहरादून
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विधा – गीत

यादे यूँ भी पुरानी चली आईं
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मन की बातें बताये तुम्हें क्या
है ये पहली मुहब्बत हमारी
भले दिन थे वो गुजरे जमाने
मीठी मीठी सी अग्न लगाई।

हम तो डरते हैं नजदीक आके
जान ले लो – ऐ जान हमारी
कब से बैठे दबाये लबों को
कब से यारी है गम से हमारी।

चढ़ गयी सर आसमाँ तक
ये नशीली रात खुमारी
बजते घुंघरू से आवाज आई
देखो कैसी चली पुरवाई।

खाली लौटे हैं तेरे जहाँ से
तूने कैसी ये लहरें जगाई
मुस्कुराते हो क्यूं ,कहो तो
जैसे ठण्डी चले पुरवाई।

दिल में करती हैं हलचल हमेशा
जैसे पहली नजर की जुदाई
आग पानी में अब तो लगी है
नजरे नजरों से जब भी मिलाई।

आकर बैठे सुकून से यहाँ हम
जैसे खुद की ही बगिया जलाई
तारे खोने लगे रौशनी सब
धरती चंदा से मिलने आई।

बाँध लो हमको अपनी ख़िजा में
खोल दो ये पायल हमारी
आँखे देने लगी आज धोखा
यादें यूँ भी पुरानी चली आई।।

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