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कवि जसवीर सिंह हलधर की गज़ल.. आया खिज़ां से जूझकर गुलशन बहार में..

जसवीर सिंह हलधर
देहरादून, उत्तराखंड
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मुक्तिका (ग़ज़ल )
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आया खिज़ां से जूझकर गुलशन बहार में।
भँवरे वहां आने लगे उड़कर कतार में।

कलियां खिली बागान में होके जवान यूँ,
तितली लगी उड़ने गुलों की ऐश-गार में।

आबो हवा में ताजगी आने लगीं है अब,
पानी नहर लाने लगीं हैं रेग- जार में।

तिश्ना-लवी में खोजता जन्नत जमीन पर,
मुर्दा हुआ है आदमी बैठा मजार में।

उस गोरकन को सत्य का अहसास ही नहीं,
जो खा रहा है कौम को रोटी अचार में।

छोड़ो वहाबी राह को ग़ज़बा- ए- हिन्द को,
ये ख्वाब मत पालो मियां अपने विचार में।

सारा जमाना खौफ़ में फैली वबात से,
क्यों मर्सिया के सुर लगाये हैं सितार में।

दावत क़ज़ा को दे रहे क्यों जान-बूझकर,
लाये ख़ुदा से चार दिन “हलधर” उधार में।

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