कवि जसवीर सिंह हलधर का एक गीत… लोक तंत्र का महा पात्र हूँ..
जसवीर सिंह हलधर
देहरादून, उत्तराखंड
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गीत – साहित्य सारथी
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लोक तंत्र का महा पात्र हूँ,
भारत भू का युद्ध शास्त्र हूँ!
सरहद का लेखा जोखा हूँ,
लाशों का भी अर्थ शास्त्र हूँ!।
शूलों की चुभन झेलता हूं,
साँपों से रोज खेलता हूं !
झोपड़ियों की पीड़ा गाता,
करुणा का मैं शोध छात्र हूं!
लोक तंत्र का महा पात्र हूँ!!
फूलों में सुरभि मंद रहता,
कांटों सी चुभन छंद कहता!
जीवन के पथरीले पथ पर,
सांसें गिनता फसा यात्र हूँ!
लोक तंत्र का महा पात्र हूँ!!
रोजाना दंगे झेले हैं,
घाटी में पंगे झेले हैं!
राहत का मैं एक शिविर हूँ,
आतंकों का कफन मात्र हूँ!
लोक तंत्र का महा पात्र हूँ!
भारत को बटते देखा हैं ,
धर्मों में छटते देखा है!
लाशों से भरी रेल देखी ,
आजादी का अर्ध रात्र हूँ!
लोक तंत्र का महा पात्र हूं!!
