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कवि जसवीर सिंह हलधर का एक गीत… जीवन में मधु घोल सके कुछ, ऐसा वातावरण कहाँ है..

जसवीर सिंह हलधर
देहरादून, उत्तराखंड
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अध्यात्म गीत -एसा वातावरण कहाँ है
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जीवन में मधु घोल सके कुछ, ऐसा वातावरण कहाँ है।
सामाजिक चिंतन वाला भी, अब नैतिक जागरण कहाँ है।

कितने जतन करे मानस ने, लोभ मोह की व्याधि न छूटे,
अंदर-अंदर कुंठा सुलगे, बाहर का जग बाहर रूठे,
सबके संरक्षण वाला अब, रक्षा का आवरण कहाँ है ।
समाजिक चिंतन वाला भी, अब नैतिक जागरण कहाँ है ।।1

भाषण बाजी बहुत हो गयी, कभी कभी खुद से भी बोलो,
गांठ खोलकर अंतर्मन की, भीतर का वातायन खोलो,
खोजो जग के निर्माता का, धरती पर अब चरण कहाँ है।
सामाजिक चिंतन वाला भी, अब नैतिक जागरण कहाँ है।।2

सदा घूमते रहे अकेले, भीड़-भाड़ के कोलाहल में,
योग ध्यान से दूर हो गए, भोग विलासा के जंगल में,
सादा जीवन जीने वाला, वैदिक रथ आमरण कहाँ है।
सामाजिक चिंतन वाला भी, अब नैतिक आचरण कहाँ है।।3

खोज न पाए ऐसा साथी, साथ रहे जिसकी पर छाई,
ऊपर-ऊपर उजला पाया, जमी रही अंतस पर काई,
जीवन के इस महासमर में, ऐसा मानक वरण कहाँ है।
सामाजिक चिंतन वाला भी, अब नैतिक आचरण कहाँ है।।4

चार दिनों के इस मेले में, थोड़ी गरिमा थोड़ा यश हो,
खूब लुटाओ प्रेम पजीरी, अंत समय तक भरा कलश हो,
मोह जाल से दूर रखे जो, “हलधर “पथ संभरण कहाँ है।
सामाजिक चिंतन वाला भी, अब नैतिक आचरण कहाँ है।।5
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सर्वाधिकार सुरक्षित।
प्रकाशित…..22/02/2021
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