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“पागल फ़क़ीरा” की एक ग़ज़ल … मेरी फ़ज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है…

“पागल फ़क़ीरा”
भावनगर, गुजरात
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मेरी फ़ज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है,
वहाँ हो तुम यहाँ पे हम बेक़रार आज भी है।
मेरी फ़ज़र को तेरा……….

वो शोखियाँ वो अदायें के तुम दिखे थे वहाँ,
तेरी अदा का वहीं पर निग़ार आज भी है।
मेरी फ़ज़र को तेरा……….

न चाहे सोच के क्यों तुमको ये हुआ अरमान,
फ़िर मेरे तन पे चली तलवार आज भी है।
मेरी फ़ज़र को तेरा……….

ओ यार तेरे लिये हमने तोड़ दी बेड़ियाँ,
जफ़ा की बात पे पागल वो यार आज भी है।
मेरी फ़ज़र को तेरा……….

हटी नहीं है नज़र नाज़ वो ये करता है,
मेरे कलाम से शायद अग़्यार आज भी है।
मेरी फ़ज़र को तेरा……….

न पूछ किसने सोहबत में नज़्म गाये है,
कि तुमको छोड़ के हम सोग़वार आज भी है।
मेरी फ़ज़र को तेरा……….

फ़क़ीरा ये ज़िन्दगी हमको न रास आई है,
लगाने गले हम मौत को तैयार आज भी है।
मेरी फ़ज़र को तेरा……….

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फ़ज़र – सुबह
निग़ार – तस्वीर
जफ़ा – ज़ुल्म, अत्याचार
अग़्यार – अजनबी
सोग़वार – दुःखी

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