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वरिष्ठ कवि पागल फकीरा की एक रचना… बन्दगी एक रोज़ आशिक़ी में ढल जाती है..

पागल फकीरा
भावनगर, गुजरात


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बन्दगी एक रोज़ आशिक़ी में ढल जाती है,
कभी सुबह तो कभी शाम नज़र जाती है।

कभी रो जाये तरस जाये नयन बेमौसम,
कभी यह आँखें अबार बन बरस जाती है।

जब छुड़ा कर निकल जाये आपका दामन,
हसीं महफ़िल की शकल ही बदल जाती है।

कांच की तरह टूट कर बिखरता है ये दिल,
मेहबूब की जब से रक़ीब से लड़ जाती है।

माज़ी के गुनाहों को गिन क्या होगा फ़क़ीरा,
वक़्त की बेबसी पर तो आँखें खुल जाती है।

अबार – अधिक समय

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